उत्तराखण्ड
वन कर्मियों का दर्द: अधिकारों की कमी और तस्करों के बढ़ते दुस्साहस से सुरक्षा पर संकट

वनकर्मियों के अनुसार, अवैध कटान, लकड़ी तस्करी और संगठित गिरोहों की सक्रियता के बीच उन्हें जान जोखिम में डालकर कार्रवाई करनी पड़ती है। कई मौकों पर तस्करों के झुंड से आमना-सामना होने पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो जाती है। कर्मचारियों का कहना है कि वे जंगलों की रक्षा को अपना नैतिक कर्तव्य मानकर आगे बढ़ते हैं, लेकिन जब कानून और व्यवस्था के स्तर पर ठोस संरक्षण नहीं मिलता, तो उनका मनोबल प्रभावित होता है।
कर्मियों ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ मामलों में तस्कर या प्रभावशाली लोग कानूनी प्रक्रियाओं का लाभ लेकर बच निकलते हैं और कुछ समय बाद फिर वन क्षेत्रों में सक्रिय हो जाते हैं। इससे न केवल वन संपदा को नुकसान पहुंचता है, बल्कि वनकर्मियों के लिए खतरा और बढ़ जाता है।
वन विभाग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, कई बार वन कर्मचारियों को पुलिस कार्रवाई में अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता। इससे विभागीय कर्मियों में यह भावना गहराती जा रही है कि वे कर्तव्य तो निभा रहे हैं, लेकिन सुरक्षा और अधिकारों के मामले में पीछे छूट रहे हैं।
वन कर्मियों ने मांग की है कि उन्हें जमीनी स्तर पर अधिक अधिकार, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था, संयुक्त कार्रवाई की स्पष्ट प्रक्रिया और तस्करों के खिलाफ त्वरित एवं सख्त कार्रवाई मिले, ताकि जंगलों की रक्षा करने वाले स्वयं असुरक्षित न रह जाएं।
यह मुद्दा केवल वन विभाग का नहीं, बल्कि पूरे पर्यावरण संरक्षण तंत्र की मजबूती से जुड़ा हुआ है। जब तक वन कर्मियों को पर्याप्त कानूनी सहारा और प्रशासनिक संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक वन तस्करी पर प्रभावी अंकुश लगाना कठिन बना रहेगा।
