उत्तराखण्ड
सशक्त मन, सशक्त परिवार : 7वें राष्ट्रीय समाज कार्य सप्ताह पर उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में ऑनलाइन सेमिनार


हल्द्वानी, 22 अगस्त। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग की ओर से 7वें राष्ट्रीय समाज कार्य सप्ताह के अवसर पर ‘सशक्त मन, सशक्त परिवार’ थीम पर ऑनलाइन सेमिनार आयोजित किया गया। सेमिनार में मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक संबंधों, अंतरपीढ़ीगत जुड़ाव तथा बदलते सामाजिक परिवेश में परिवार की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती कुशा सिंह ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ किया। समाज कार्य विभाग की समन्वयक डॉ. नीरजा सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी के मार्गदर्शन के प्रति आभार व्यक्त किया।
भारत में व्यावसायिक समाज कार्यकर्ताओं के राष्ट्रीय संघ (एनएपीएसडब्ल्यूआई) के प्रो. अनूप कुमार भारतीय ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य की मजबूती की शुरुआत परिवार से ही होती है। उन्होंने कहा कि सरकार और विभिन्न संस्थाएं इस दिशा में प्रयास कर रही हैं, लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश में मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक सहयोग का विषय और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। वर्तमान समय को संक्रमणकाल बताते हुए उन्होंने जीवन की कठिन परिस्थितियों को अधिक मानवीय, संतुलित और बेहतर बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय की प्रो. प्रतिभा जे. मिश्रा मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुईं। उनका परिचय उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पूजा हेड़िया ने कराया। प्रो. मिश्रा ने कहा कि बेहतर मानसिक स्वास्थ्य और स्वस्थ परिवार के निर्माण की दिशा में ऐसे कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि परिवार में संवाद, विश्वास और सहयोग का वातावरण विकसित कर कई मानसिक समस्याओं का शुरुआती स्तर पर समाधान किया जा सकता है।
उन्होंने 3C—जुड़ाव, संवाद और रचनात्मक दृष्टिकोण तथा सकारात्मक जीवनशैली पर विशेष बल दिया। मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए उन्होंने सकारात्मक लोगों के साथ जुड़ने, संतुलित भोजन पर ध्यान देने, आवश्यकता होने पर औषधि के प्रति लापरवाही न बरतने, मानसिक स्थिति की नियमित निगरानी करने तथा योग, ध्यान एवं रुचि आधारित गतिविधियों को जीवन में शामिल करने की सलाह दी।
द्वितीय वक्ता सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ. तूलिका भट्टाचार्य ने अंतरपीढ़ीगत संबंधों और बुजुर्गों की देखभाल पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि भौगोलिक दूरी के बावजूद परिवार भावनात्मक रूप से जुड़े रह सकते हैं। बुजुर्गों की देखभाल केवल युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि बुजुर्ग भी परिवार और युवा पीढ़ी को अनेक प्रकार का सहयोग देते हैं। उन्होंने अंतरपीढ़ीगत संबंधों को पारस्परिक बताते हुए कहा कि दोनों पक्षों का योगदान हमेशा समान नहीं होता, लेकिन दोनों एक-दूसरे के लिए महत्वपूर्ण हैं।
डॉ. भट्टाचार्य ने स्मृतिलोप यानी डिमेंशिया के संदर्भ में अंतरपीढ़ीगत जुड़ाव को समझने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे जुड़ाव का अर्थ केवल बातचीत या स्मृतियों के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न पीढ़ियों का डिमेंशिया से प्रभावित व्यक्ति के साथ सम्मान, धैर्य, भावनात्मक उपस्थिति और साझा गतिविधियों के माध्यम से जुड़े रहना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो

















