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उत्तराखण्ड

GPS और पैनिक बटन व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल, परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर लगे पारदर्शिता के अभाव के आरोप

 

हल्द्वानी,,। व्यावसायिक वाहनों में अनिवार्य रूप से लगाए जा रहे GPS (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) और पैनिक बटन की कार्यप्रणाली को लेकर उत्तराखंड परिवहन विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से प्राप्त जानकारी और वाहन संचालकों के आरोपों ने इस पूरी व्यवस्था की प्रभावशीलता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

भारत सरकार ने यात्रियों और वाहन चालकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सभी व्यावसायिक वाहनों में GPS और पैनिक बटन लगाना अनिवार्य किया था। GPS का उद्देश्य वाहन की वास्तविक समय में निगरानी करना और पैनिक बटन का उद्देश्य किसी भी आपातकालीन स्थिति में कंट्रोल सेंटर तक तत्काल अलर्ट पहुंचाकर त्वरित सहायता उपलब्ध कराना है।

हालांकि, वाहन संचालकों का कहना है कि जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था अपेक्षित रूप से काम नहीं कर रही है। उनका कहना है कि वाहन स्वामियों से उपकरण खरीदने, इंस्टॉलेशन और वार्षिक रिचार्ज के नाम पर शुल्क लिया जा रहा है, लेकिन सुरक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल बने हुए हैं।

RTI से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2019 से 31 मार्च 2026 तक पैनिक बटन के उपयोग के हजारों और लाखों मामले दर्ज किए गए हैं। विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2019 में 182, वर्ष 2020 में 287, वर्ष 2021 में 1,861, वर्ष 2022 में 11,42,997, वर्ष 2024 में 90,080, वर्ष 2025 में 40,055 तथा 31 मार्च 2026 तक 8,908 बार पैनिक बटन सक्रिय होने का दावा किया गया है।

लेकिन जब इन मामलों का विस्तृत विवरण मांगा गया तो अधिकांश मामलों में विभाग की ओर से एक जैसे उत्तर दिए गए—”मोबाइल स्विच ऑफ था”, “नंबर संपर्क योग्य नहीं था” अथवा “कॉलर से संपर्क नहीं हो सका”। इससे यह सवाल उठ रहा है कि यदि अधिकांश मामलों में सहायता उपलब्ध नहीं हो सकी, तो पैनिक बटन व्यवस्था की वास्तविक उपयोगिता क्या है।

वाहन संचालकों का आरोप है कि 9 मार्च 2026 को मीडिया की मौजूदगी में एक व्यावसायिक वाहन का पैनिक बटन कई बार दबाकर इसका परीक्षण किया गया। इस दौरान पूरी घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई और समाचार माध्यमों में प्रसारित हुई। आरोप है कि इसके बावजूद किसी भी कंट्रोल सेंटर से कोई अलर्ट या प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई। यदि यह दावा सही है, तो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज लाखों अलर्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी उठाया जा रहा है कि यदि राज्य में प्रभावी कंट्रोल रूम ही पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो रहा, तो लाखों वाहनों में GPS और पैनिक बटन लगवाने का उद्देश्य कैसे पूरा होगा। वाहन संचालकों का कहना है कि पहले सरकार को मजबूत निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली स्थापित करनी चाहिए, उसके बाद ही वाहन स्वामियों पर इस व्यवस्था का आर्थिक बोझ डाला जाना चाहिए।

वाहन स्वामियों ने यह भी आरोप लगाया है कि परिवहन विभाग आज तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि GPS एवं पैनिक बटन लगाने के लिए अधिकृत वेंडर कौन हैं, उपकरणों की निर्धारित कीमत क्या है, वार्षिक रिचार्ज शुल्क किस आधार पर तय किया गया है और अधिकृत शुल्क कितना है। उनका कहना है कि बार-बार जानकारी मांगने के बावजूद इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर नहीं दिए गए।

टैक्सी यूनियनों और व्यावसायिक वाहन संगठनों का कहना है कि यदि सुरक्षा प्रणाली प्रभावी नहीं है, तो वाहन स्वामियों से शुल्क वसूलना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। उन्होंने सरकार से मांग की है कि पूरे GPS और पैनिक बटन सिस्टम का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए, कंट्रोल रूम की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए, अधिकृत वेंडरों और शुल्क का पूरा विवरण जारी किया जाए तथा व्यवस्था को पूरी तरह कार्यशील बनाने के बाद ही इसे अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।

नोट: इस समाचार में वर्णित आरोप RTI से प्राप्त जानकारी तथा संबंधित वाहन संचालकों और संगठनों के दावों पर आधारित हैं। परिवहन विभाग का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।

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