उत्तराखण्ड
₹300 की मजदूरी के लिए इतनी सख्ती क्यों? ग्राम प्रधान वीरा रावत ने VB-G RAM G के फेस वेरिफिकेशन पर उठाए सवाल

पौड़ी। उत्तराखंड के पौड़ी जिले के मरोड़ा गांव की युवा ग्राम प्रधान वीरा रावत एक बार फिर चर्चाओं में हैं। इस बार उन्होंने VB-G RAM G (Viksit Bharat–Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission–Gramin) के तहत मजदूरों की हाजिरी और फेस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया में आ रही दिक्कतों को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और बड़ी संख्या में लोग इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
वीरा रावत ने वीडियो में कहा कि सरकार द्वारा पारदर्शिता सुनिश्चित करना अच्छी बात है, लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने वाले मजदूरों के लिए प्रक्रिया को इतना जटिल नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि करीब 300 रुपये की मजदूरी के लिए ई-केवाईसी, फेस वेरिफिकेशन और दो बार हाजिरी जैसी प्रक्रियाओं से ग्रामीण मजदूर और ग्राम प्रधान दोनों परेशान हो रहे हैं।
उन्होंने फेस वेरिफिकेशन की तकनीकी समस्या का उदाहरण देते हुए कहा कि ई-केवाईसी पूरी होने के बावजूद कई बार ऐप मजदूर का चेहरा पहचान नहीं पा रहा है। बार-बार फेस मिसमैच होने के कारण मजदूरों का काफी समय हाजिरी लगाने में ही चला जाता है। ऐसे में उनका सवाल है कि यदि हाजिरी की प्रक्रिया में ही लंबा समय लगेगा तो मजदूर काम कब करेगा।
वीरा रावत ने कहा कि गांवों में मजदूरों की दैनिक मजदूरी इससे कहीं अधिक है, ऐसे में सरकारी योजना में मिलने वाली मजदूरी के लिए अत्यधिक तकनीकी औपचारिकताएं लोगों को योजना के तहत काम करने से हतोत्साहित कर सकती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पारदर्शिता के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उनका कहना है कि पारदर्शिता की व्यवस्था हर स्तर पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
उन्होंने ठेकेदारों को दिए जाने वाले बड़े निर्माण कार्यों के टेंडरों का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि करोड़ों रुपये के कार्यों में भी पारदर्शिता और गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं, जबकि ग्रामीण मजदूरों की छोटी मजदूरी के भुगतान के लिए बेहद कड़ी तकनीकी व्यवस्था लागू की जा रही है।
मजदूरी नहीं आई तो प्रधान को जिम्मेदार मानते हैं ग्रामीण
वीरा रावत ने ग्राम प्रधानों की एक बड़ी व्यावहारिक समस्या भी सामने रखी। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में सभी लोगों को ऑनलाइन भुगतान और DBT की पूरी जानकारी नहीं होती। यदि किसी मजदूर की मजदूरी समय पर खाते में नहीं पहुंचती तो वह अक्सर प्रधान को ही जिम्मेदार मानता है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीणों को लगता है कि मजदूरी प्रधान के पास आई होगी और प्रधान ने उनका पैसा नहीं दिया। जबकि वास्तविकता यह है कि मजदूरी का भुगतान ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से होता है। ऐसी स्थिति में सरकार और ग्रामीणों के बीच ग्राम प्रधान फंस जाते हैं।
वीरा रावत ने कहा कि ग्राम प्रधानों को एक ओर सरकार के नियमों का पालन करना पड़ता है और दूसरी ओर ग्रामीणों की समस्याओं का जवाब भी देना पड़ता है। फेस वेरिफिकेशन में तकनीकी दिक्कतें बढ़ने से यह जिम्मेदारी और मुश्किल हो रही है।
सोशल मीडिया पर मिल रही मिली-जुली प्रतिक्रियाएं
वीरा रावत के वीडियो पर सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई लोग उनकी बात का समर्थन करते हुए इसे ग्राम प्रधानों और ग्रामीण मजदूरों की वास्तविक समस्या बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और फर्जीवाड़ा रोकने के लिए डिजिटल सत्यापन को जरूरी बता रहे हैं।
वीरा रावत पहले भी अपने गांव में शराबबंदी जैसे मुद्दों को लेकर चर्चा में रह चुकी हैं। अब VB-G RAM G की तकनीकी प्रक्रिया को लेकर उनका यह वीडियो ग्रामीण रोजगार योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन और ग्राम प्रधानों की भूमिका पर नई बहस छेड़ता नजर आ रहा है।
मुख्य सवाल यही है कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और फर्जीवाड़े पर रोक के साथ-साथ तकनीकी प्रक्रिया को ग्रामीण मजदूरों और ग्राम प्रधानों के लिए कितना सरल बनाया जा सकता है।
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