उत्तराखण्ड
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और समय का सच: हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आत्ममंथन और आह्वान

अजय सिंह – विशेष संवाददाता
“हिंदुस्थानियों के हित के हेत” — इसी पावन ध्येय वाक्य के साथ 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने देश के पहले हिंदी अखबार ‘उदन्त मार्तण्ड’ की नींव रखी थी। आज जब हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज के सबसे सजग प्रहरी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पत्रकारिता के भविष्य को लेकर आत्ममंथन करने का दिन है।
पत्रकार साथियों को सलाम: कलम की धार और निष्पक्षता का संकल्प
आज का दिन उन तमाम पत्रकारों को समर्पित है जो चिलचिलाती धूप, कड़ाके की ठंड या किसी भी विषम परिस्थिति की परवाह किए बिना समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ को मुख्यधारा में लाते हैं।
सत्य के प्रति अटूट निष्ठा: एक ऐसे दौर में जहाँ सूचनाओं की बाढ़ है और ‘फेक न्यूज’ का जाल फैला है, वहाँ आपकी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। आपकी कलम किसी दल, विचारधारा या दबाव की गुलाम नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ ‘जनता के सच’ के प्रति जवाबदेह है।
बदलते दौर में साख की चुनौती: डिजिटल क्रांति और सोशल मीडिया के इस युग में गति (Speed) से ज़्यादा महत्व साख का है। खोजी पत्रकारिता और जमीनी रिपोर्टिंग ही पत्रकारिता की असली आत्मा हैं, इसे हमें जीवित रखना होगा।
साथी पत्रकारों से अपील: आइए, आज के दिन हम अपनी रीढ़ को और मजबूत करने का संकल्प लें। याद रखें, जब व्यवस्थाएं सो जाती हैं, तब आपकी एक हेडलाइन समाज को जगाने का काम करती है।
सरकार से सीधा संवाद: चौथे स्तंभ की सुरक्षा और स्वायत्तता हमारा अधिकार
एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र तभी फल-फूल सकता है जब उसका चौथा स्तंभ स्वतंत्र, सुरक्षित और भयमुक्त होकर काम कर सके। पत्रकारिता दिवस के इस मौके पर हम सरकार का ध्यान कुछ अत्यंत संवेदनशील और जरूरी बिंदुओं की ओर आकर्षित करना चाहते हैं:
सुरक्षा की गारंटी फील्ड में काम कर रहे पत्रकारों पर बढ़ते हमलों और धमकियों को रोकने के लिए सख्त ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ लागू किया जाए।
आर्थिक सुरक्षा छोटे और क्षेत्रीय स्तर के पत्रकारों (विशेषकर ग्रामीण इलाकों में) के लिए न्यूनतम मानदेय, स्वास्थ्य बीमा और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं अनिवार्य हों।
सेंसरशिप से मुक्ति सत्ता चाहे किसी की भी हो, सच लिखने और दिखाने पर पत्रकारों के खिलाफ दमनकारी या दुर्भावनापूर्ण कानूनी कार्रवाइयों पर रोक लगनी चाहिए।
सरकार को यह समझना होगा कि पत्रकार व्यवस्था के दुश्मन नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े सुधारक होते हैं। जब एक पत्रकार किसी कमी को उजागर करता है, तो वह वास्तव में सरकार को नीति-सुधार का एक मौका दे रहा होता है।
निष्कर्ष: एक नए सवेरे की ओर
हिंदी पत्रकारिता ने आज एक वैश्विक पहचान बनाई है। यह देश के करोड़ों लोगों के सुख-दुख, संस्कृति और आकांक्षाओं की भाषा है। आइए, इस ऐतिहासिक दिन पर हम सब – पत्रकार, जनता और सरकार – मिलकर एक ऐसा माहौल तैयार करें जहाँ सच बोलना अपराध न हो, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम बने।
सभी पत्रकार साथियों को ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएं ।
