Connect with us

उत्तराखण्ड

वन हमारी सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरणीय सुरक्षा के आधार: राज्यपाल गुरमीत सिंह

 

, 23 जून। उत्तराखण्ड के राज्यपाल Lt Gen Gurmit Singh ने सोमवार को लोक भवन, नैनीताल में उत्तराखण्ड वन विभाग द्वारा आयोजित ‘प्रकृति के प्रहरी’ वनकर्मी सम्मान एवं पुस्तक विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में प्रतिभाग किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि वन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, पारिस्थितिक संतुलन और मानव सभ्यता के महत्वपूर्ण संरक्षक हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति और मानव का अस्तित्व एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है तथा विकसित भारत और विकसित उत्तराखण्ड का लक्ष्य तभी साकार हो सकता है, जब विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ें।

उत्कृष्ट कार्य करने वाले वनकर्मी हुए सम्मानित

राज्यपाल ने वन एवं वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले वनकर्मियों को सम्मानित किया। उन्होंने सम्मानित कर्मियों को प्रकृति का सच्चा प्रहरी बताते हुए कहा कि वनकर्मी भीषण वनाग्नि, प्राकृतिक आपदाओं और कठिन परिस्थितियों में अपने प्राणों की परवाह किए बिना वनों और वन्यजीवों की रक्षा में जुटे रहते हैं। उनका समर्पण, साहस और सेवा भाव उत्तराखण्ड की हरित चेतना को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

चार महत्वपूर्ण पुस्तकों का हुआ विमोचन

समारोह के दौरान राज्यपाल ने ‘राजाजी में पूर्णिमा की वह रात’, Common Birds of Almora and Nainital, From Roots to Riches तथा Beehive Fencing का विमोचन किया। उन्होंने कहा कि ये पुस्तकें प्रकृति, जैव विविधता, आजीविका संवर्धन तथा नवाचार के विभिन्न आयामों को सामने लाती हैं। विशेष रूप से ‘राजाजी में पूर्णिमा की वह रात’ पुस्तक प्रकृति और वन्यजीवन के साथ मानवीय संवेदनाओं एवं आध्यात्मिक जुड़ाव को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।

भारतीय संस्कृति में वनों का विशेष महत्व

राज्यपाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति में वनों को सदैव देवतुल्य माना गया है। हमारी सनातन परम्परा अरण्य संस्कृति की परम्परा रही है तथा वेदों और उपनिषदों की रचना भी वनांचलों में हुई। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में वृक्षों को जीवनदाता बताया गया है और मत्स्य पुराण में एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान माना गया है, जो प्रकृति संरक्षण के महत्व को दर्शाता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखण्ड की बढ़ी जिम्मेदारी

राज्यपाल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक चुनौतियों के बीच उत्तराखण्ड की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने बताया कि राज्य का लगभग 71 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है, जो इसकी समृद्ध प्राकृतिक धरोहर का प्रतीक है। उत्तराखण्ड के वन, ग्लेशियर और नदियाँ करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं।

उन्होंने Chipko Movement का उल्लेख करते हुए कहा कि Gaura Devi और उनकी साथियों ने पूरी दुनिया को प्रकृति संरक्षण का प्रेरक संदेश दिया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

तकनीक और जनसहभागिता से मिलेगी चुनौतियों से राहत

राज्यपाल ने कहा कि वनाग्नि और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी समस्याओं से निपटने के लिए तकनीक, नवाचार और जनसहभागिता अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने ‘Beehive Fencing’ जैसी वैज्ञानिक पहल की सराहना करते हुए कहा कि इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के साथ-साथ मधुमक्खी पालन के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायता मिलेगी।

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान का किया उल्लेख

उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल वन विभाग का दायित्व नहीं बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। इस दौरान उन्होंने एक पेड़ माँ के नाम अभियान का उल्लेख करते हुए प्रकृति संरक्षण को जन-आन्दोलन का स्वरूप देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में प्रकृति, जल और वृक्षों के प्रति प्रेम एवं उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना समय की मांग है।

अधिकारियों और विशेषज्ञों की रही उपस्थिति

कार्यक्रम की शुरुआत में कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने स्वागत उद्बोधन दिया, जबकि अपर प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. विवेक पाण्डेय ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में वन एवं वन्यजीव संरक्षण विषयक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।

इस अवसर पर प्रमुख वन संरक्षक (कुमाऊँ) डॉ. तेजस्विनी अरविन्द पाटिल, वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, सम्मानित वनकर्मी तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

ADVERTISEMENTS Ad

More in उत्तराखण्ड

Trending News

Follow Facebook Page