उत्तराखण्ड
संस्कृत को डिजिटल युग की तकनीक, शोध और नवाचार से जोड़ना समय की आवश्यकता : राज्यपाल





हरिद्वार। संस्कृत केवल भारत की प्राचीन भाषा और विरासत नहीं, बल्कि देश की ज्ञान-चेतना, चिंतन परंपरा और संस्कारों की जीवंत धारा है। आवश्यकता है कि संस्कृत के इस समृद्ध ज्ञान को अलमारियों और पुस्तकों तक सीमित न रखते हुए डिजिटल संसार, शोध प्रयोगशालाओं और वैश्विक ज्ञान-विमर्श तक पहुंचाया जाए।
यह बात उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने हरिद्वार स्थित उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के 12वें दीक्षांत समारोह में छात्र-छात्राओं को उपाधियां एवं पदक प्रदान करते हुए कही। इस अवसर पर उन्होंने संस्कृत की ज्ञान परंपरा से जुड़ी नई पीढ़ी के विद्यार्थियों से संवाद किया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
राज्यपाल ने कहा कि देवभाषा संस्कृत को देवभूमि की युवा ऊर्जा के साथ जोड़ते हुए आधुनिक तकनीक, शोध और नवाचार की शक्ति से समृद्ध करना होगा। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), डिजिटल तकनीक, भाषा-विज्ञान और मशीन ट्रांसलेशन जैसे आधुनिक क्षेत्रों में संस्कृत के वैज्ञानिक स्वरूप तथा उसके विशाल साहित्य पर व्यापक शोध की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि बदलते तकनीकी युग में संस्कृत के विद्यार्थियों और शोधार्थियों को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ना आवश्यक है, ताकि संस्कृत केवल अतीत की गौरवशाली विरासत के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की ज्ञान अर्थव्यवस्था और वैश्विक अकादमिक विमर्श में भी अपनी प्रभावी भूमिका निभा सके।
दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह शोधार्थियों के लिए बनेगा महत्वपूर्ण आधार
राज्यपाल ने विश्वविद्यालय को लगभग दस हजार दुर्लभ पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं का अमूल्य संग्रह प्रदान करने के लिए पद्मश्री अभिराज राजेन्द्र मिश्र के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ‘अभिराज-पुस्तक-वीथी’ के रूप में संरक्षित यह ज्ञान-संपदा विद्यार्थियों, शोधार्थियों और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्रोत बनेगी।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार के दुर्लभ ग्रंथों और पुस्तकों का संरक्षण केवल साहित्यिक धरोहर को सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल स्रोतों को भविष्य के शोध के लिए उपलब्ध कराना भी है।
दीक्षांत समारोह में उपाधि एवं पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को बधाई देते हुए राज्यपाल ने कहा कि शिक्षा की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब विद्यार्थी अपने ज्ञान का उपयोग समाज और राष्ट्र के निर्माण में करें। उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी जड़ों और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े रहते हुए आधुनिक तकनीक और नवाचार के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया।

















