Connect with us

उत्तराखण्ड

वैज्ञानिक तकनीक से रेशमकीट पालन को मिलेगा बढ़ावा, किसानों की आय बढ़ाने की नई पहल

देहरादून ,,तंबर 2026। वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत केंद्रीय रेशम बोर्ड के क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र, सहसपुर में आदर्श एवं वहनीय रेशमकीट पालन गृह का उद्घाटन किया गया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने नव-निर्मित पालन गृह का लोकार्पण किया। इस अवसर पर तकनीकी संवाद कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया, जिसमें वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से रेशम उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि पर चर्चा हुई।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं राष्ट्रगीत के साथ हुआ। इसके बाद अतिथियों ने आदर्श एवं किफायती रेशमकीट पालन गृह का लोकार्पण किया। इस मॉडल को किसानों के लिए वैज्ञानिक, कम लागत वाला और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इसमें तापमान और आर्द्रता को नियंत्रित कर रेशमकीटों के बेहतर विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने पर विशेष जोर दिया गया है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा कि आदर्श एवं किफायती रेशमकीट पालन गृह का यह मॉडल ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने युवाओं को रेशम उत्पादन के क्षेत्र में उपलब्ध संभावनाओं से जोड़ने तथा आधुनिक तकनीकों के साथ रेशमकीट पालन अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मनुष्य के बेहतर स्वास्थ्य और विकास के लिए पौष्टिक भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार रेशमकीटों के समुचित विकास और गुणवत्तापूर्ण कोकून उत्पादन के लिए गुणवत्तापूर्ण शहतूत की पत्तियां जरूरी हैं। उन्होंने पालन गृह के अंदर तापमान और वातावरण को नियंत्रित रखने के महत्व को रेखांकित किया। प्रो. पंत ने बताया कि अल्मोड़ा के खूंट गांव में आईआईटी रुड़की की ओर से करीब एक लाख शहतूत के पौधे लगाए गए हैं, जो रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

रेशम निदेशालय, उत्तराखंड के निदेशक प्रदीप कुमार ने कहा कि सतत विकास के लिए रेशमकीट पालन को किफायती और पर्यावरण-अनुकूल बनाना आवश्यक है। इस मॉडल की मदद से किसानों को वर्ष में एक से अधिक रेशम फसल लेने की सुविधा मिल सकती है। इससे उत्पादन बढ़ने के साथ किसानों की आय में वृद्धि की संभावनाएं भी मजबूत होंगी। उन्होंने कहा कि किसानों की आय में निरंतर वृद्धि करना प्राथमिक उद्देश्य है और बहुफसली रेशमकीट पालन इस दिशा में प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है।

केंद्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, पाम्पोर के निदेशक डॉ. एन. शक्तिवेल ने रेशमकीटों के पोषण और मौसमी चुनौतियों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण कोकून उत्पादन के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली शहतूत की पत्तियों की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण है। गर्मी के मौसम में तापमान और नमी में होने वाले बदलाव रेशमकीटों के विकास तथा कोकून की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किया गया यह पालन गृह तापमान और आर्द्रता को अनुकूल बनाए रखने में सहायक हो सकता है।

कार्यक्रम के दौरान किसानों एवं लाभार्थियों को पालन गृह की तकनीकी विशेषताओं का सजीव प्रदर्शन भी किया गया। वैज्ञानिक-डी डॉ. इरफान इलाही ने इसकी संरचना, तापमान एवं आर्द्रता नियंत्रण तथा रेशमकीट पालन में इसकी उपयोगिता की विस्तार से जानकारी दी। तकनीकी प्रदर्शन के आयोजन में वैज्ञानिक-बी डॉ. ई. अरसाकुमार और डॉ. साक्षी वैष्णव का भी सहयोग रहा।

कार्यक्रम में आईआईटी रुड़की के प्रो. अक्षय द्विवेदी एवं उनकी तकनीकी टीम सहित केंद्रीय रेशम बोर्ड के विभिन्न केंद्रों के प्रभारी अधिकारी तथा रेशम निदेशालय के अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे। अतिथियों को स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र, सहसपुर के प्रमुख एवं वैज्ञानिक-डी डॉ. पवन सैनी ने बताया कि आदर्श एवं वहनीय रेशमकीट पालन गृह की अवधारणा केंद्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, पाम्पोर के पूर्व निदेशक डॉ. सरदार सिंह ने प्रस्तुत की थी। उन्होंने उम्मीद जताई कि कम लागत और वैज्ञानिक रूप से विकसित इस मॉडल को अपनाकर रेशम उत्पादकों को बेहतर पालन सुविधाएं मिलेंगी तथा उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार होगा।

कार्यक्रम के बाद मुख्य अतिथि एवं अधिकारियों ने केंद्र परिसर स्थित सेरी-म्यूजियम का भ्रमण कर रेशम उत्पादन से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अवलोकन किया। परिसर में पौधारोपण भी किया गया।

कुल मिलाकर, सहसपुर में विकसित यह आदर्श एवं वहनीय रेशमकीट पालन गृह वैज्ञानिक तकनीक को किसानों की व्यावहारिक जरूरतों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे रेशमकीटों के लिए बेहतर पालन वातावरण उपलब्ध होने के साथ उत्पादन, गुणवत्ता और किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाओं को बल मिलने की उम्मीद है।

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad

More in उत्तराखण्ड

Trending News

Follow Facebook Page