उत्तराखण्ड
बाढ़ के बाद नई उम्मीद: असम के जुनाकीमंडल गांव में पुनर्वास की दिशा में CSIR की वैज्ञानिक पहल




देहरादून, 22 सितंबर 2026। असम में हाल ही में आई भीषण बाढ़ से प्रभावित जोरहाट जिले के तिताबोर स्थित जुनाकीमंडल गांव में सुरक्षित पुनर्वास और आपदा-रोधी ग्रामीण आवास की दिशा में वैज्ञानिक पहल शुरू की गई है। CSIR स्मार्ट विलेज मिशन के तहत CSIR-CBRI की बहुविषयक टीम ने गांव का दौरा कर बाढ़ से प्रभावित आवासों और ग्रामीण आधारभूत संरचनाओं का वैज्ञानिक आकलन किया।
बाढ़ के कारण कई आवासीय भवनों, सामुदायिक सुविधाओं और ग्रामीण आधारभूत ढांचे को नुकसान पहुंचा है। इसके मद्देनजर टीम ने प्रभावित भवनों में हुए संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक नुकसान का सर्वेक्षण किया तथा कमजोर हिस्सों की पहचान कर मरम्मत, रेट्रोफिटिंग और सुदृढ़ीकरण के उपाय सुझाए।
CSIR स्मार्ट विलेज मिशन के उद्देश्यों के अनुरूप प्रो. प्रदीप कुमार रमनचारला, मिशन निदेशक तथा मिशन के नोडल वैज्ञानिक डॉ. किशोर एस. कुलकर्णी के मार्गदर्शन में यह मैदानी पहल की गई। टीम में डॉ. चंदन स्वरूप मीणा, डॉ. आर. शिव चिदंबरम, आर्किटेक्ट निशा, डॉ. सुमित, सुश्री अरुंधती, श्री अनुज और श्री प्रीतम शामिल रहे।
‘आवास सक्षम’ कार्यक्रम में सुरक्षित आवास तकनीकों का प्रदर्शन
जुनाकीमंडल गांव में ‘आवास सक्षम: PMAY-G लाभार्थियों के लिए तकनीकी जागरूकता एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शन’ कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें 150 से अधिक लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के लाभार्थियों को सुरक्षित, किफायती, टिकाऊ और आपदा-रोधी आवास तकनीकों की जानकारी देना रहा।
बाढ़ और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को देखते हुए भवन मरम्मत एवं रेट्रोफिटिंग, प्लिंथ प्रोटेक्शन वॉल, नॉन-इरोडेड मड प्लास्टर, फायर-रिटार्डेंट थैच रूफ तथा बांस आधारित सुरक्षित एवं टिकाऊ आवास तकनीकों पर विशेष जोर दिया गया।
75 प्रतिशत तक ऊर्जा बचत वाली तकनीक
कार्यक्रम में CSIR-CBRI की विभिन्न तकनीकों का प्रदर्शन भी किया गया। इनमें हाइब्रिड सोलर वॉटर हीटिंग एवं स्पेस कंडीशनिंग तकनीक प्रमुख रही। डॉ. चंदन स्वरूप मीणा द्वारा विकसित यह तकनीक विद्यालयों और आंगनवाड़ी केंद्रों में गर्म पानी, स्पेस कंडीशनिंग और रसोई संबंधी जरूरतों के लिए उपयोगी हो सकती है।
CSIR-CBRI के अनुसार यह प्रणाली पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में 75 प्रतिशत तक ऊर्जा खपत कम कर सकती है। इससे ग्रामीण और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में ग्रिड बिजली तथा पारंपरिक तापन प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
यह तकनीक CSIR-CBRI रुड़की में विकसित एवं सत्यापित की गई है और कल्पा, किन्नौर तथा ITBP लेह-लद्दाख में स्थापित की जा चुकी है।
पोर्टेबल मशीन से स्थानीय स्तर पर ईंट-ब्लॉक निर्माण
गांव में पोर्टेबल ईंट-ब्लॉक निर्माण मशीन का भी प्रदर्शन किया गया। करीब 100 से 125 किलोग्राम वजन वाली इन मशीनों को स्थानीय सामग्री के साथ उपयोग किया जा सकता है तथा इन्हें मैनुअल और बिजली दोनों माध्यमों से संचालित किया जा सकता है।
इन मशीनों से आठ घंटे में लगभग 800 से 1,000 ब्लॉक अथवा 1,800 से 2,400 ईंटें तैयार की जा सकती हैं। इससे स्थानीय स्तर पर निर्माण सामग्री उपलब्ध कराने के साथ रोजगार के अवसरों को बढ़ावा मिलने की संभावना है। इस तकनीक का प्रदर्शन मध्य प्रदेश, ओडिशा और असम के विभिन्न गांवों में किया जा रहा है।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए एयर डिसइन्फेक्शन सिस्टम
बाढ़ के बाद इनडोर एयर-क्वालिटी से जुड़ी संभावित समस्याओं को ध्यान में रखते हुए गांव में स्टैंडअलोन एयर डिसइन्फेक्शन सिस्टम तैनात करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इसका उद्देश्य सीमित वेंटिलेशन वाले स्थानों में हवा के कीटाणुशोधन में सहायता करना है।
राजमिस्त्रियों और निर्माण श्रमिकों को मिलेगा प्रशिक्षण
CSIR-CBRI द्वारा गांव और आसपास के क्षेत्रों के राजमिस्त्रियों तथा निर्माण श्रमिकों के लिए तकनीकी प्रशिक्षण आयोजित करने की योजना भी बनाई गई है। प्रशिक्षण में सुरक्षित और वैज्ञानिक निर्माण तकनीकों के साथ आधुनिक निर्माण पद्धतियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
CSIR की यह पहल ‘प्रयोगशाला से धरातल’ की अवधारणा के तहत वैज्ञानिक तकनीकों को सीधे ग्रामीण समुदायों तक पहुंचाने का प्रयास है। इसके माध्यम से बाढ़ प्रभावित परिवारों के सुरक्षित आवास, ऊर्जा दक्षता, स्थानीय तकनीकी क्षमता और भविष्य की आपदाओं से निपटने की क्षमता को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

















