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उत्तराखण्ड

जिम्मेदारियों के बोझ तले भी नहीं टूटी रज्जो की हिम्मत, मेहनत से जगा रहीं स्वच्छता की अलख

न कोई सरकारी नौकरी, न नगर निगम से वेतन की आस; अपने दम पर दो गलियों की सफाई कर परिवार का पाल रहीं पेट

कुछ कर गुजरने का जज्बा हो और सिर पर परिवार की जिम्मेदारियां हों, तो इंसान मेहनत के दम पर मुश्किल से मुश्किल रास्ता भी तलाश लेता है। ऐसी ही मिसाल हैं पर्यावरण मित्र रज्जो, जो अपने परिवार का गुजर-बसर करने के लिए खुद मेहनत करती हैं और साथ ही अपने मोहल्ले की सफाई का जिम्मा भी उठाती हैं। उनकी कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो परिस्थितियों के आगे हार मान लेते हैं।

रज्जो अपने निजी सफाई रिक्शे के माध्यम से दो गलियों से कूड़ा एकत्र करती हैं। जब उनसे मुलाकात हुई, तो पहली नजर में लगा कि वह नगर निगम की संविदा कर्मचारी होंगी और सफाई के बदले उन्हें नियमित मानदेय मिलता होगा। लेकिन बातचीत में पता चला कि वह किसी सरकारी व्यवस्था के तहत नहीं, बल्कि अपने स्तर पर यह काम करती हैं। मोहल्ले की सफाई के साथ-साथ वह अपने परिवार की आजीविका चलाने के लिए भी संघर्ष कर रही हैं।

बातचीत के दौरान रज्जो ने बताया कि घर में कमाने वाला कोई नहीं है। परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर हैं। कुछ लोग आर्थिक मदद कर देते हैं, जिससे महीने में लगभग 2500 से 3000 रुपये तक जुट जाते हैं और किसी तरह घर का गुजारा हो जाता है। इतनी कम आमदनी में परिवार चलाना कितना कठिन होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

लेकिन रज्जो की पहचान केवल उनकी मजबूरी नहीं, बल्कि उनका हौसला और काम के प्रति समर्पण है। वह कहती हैं कि जब जिम्मेदारी सिर पर हो, तो व्यक्ति को मेहनत करने के रास्ते तलाशने ही पड़ते हैं। यही सोच उन्हें हर दिन अपने काम पर निकलने की ताकत देती है।

दूसरों के लिए भी मिसाल है रज्जो का काम

आज हममें से बहुत से लोग अपने घर की सफाई तक ही सीमित रहते हैं। घर का कूड़ा एकत्र किया और उसे किसी खाली प्लॉट या सुनसान जगह पर फेंक दिया। इसके बाद हम अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। लेकिन रज्जो की सोच इससे अलग है। उनका कहना है कि यदि गली में कहीं कूड़ा दिखाई देता है, तो वह उसे भी अपने रिक्शे में उठाकर ले जाती हैं। उनके लिए सफाई केवल अपने निर्धारित काम तक सीमित नहीं, बल्कि आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी भी है।

रज्जो की यह पहल हमें सोचने पर मजबूर करती है कि स्वच्छता केवल नगर निगम या सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सभी का सामूहिक दायित्व है। जिस महिला के पास न सरकारी नौकरी है और न निश्चित वेतन, वह अपने स्तर पर मोहल्ले को साफ रखने का प्रयास कर रही है। वहीं, हममें से कई लोग अपनी छोटी-सी जिम्मेदारी निभाने से भी पीछे हट जाते हैं।

रज्जो को सलाम, उनकी मेहनत को सम्मान

रज्जो जैसी महिलाएं समाज की असली ताकत हैं। वे बिना किसी बड़े पद, पहचान या प्रशंसा की अपेक्षा के अपने काम में जुटी रहती हैं। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मेहनत और आत्मसम्मान का रास्ता कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

जरूरत इस बात की है कि ऐसे लोगों के प्रयासों को पहचान मिले। स्थानीय प्रशासन और नगर निगम को भी रज्जो जैसी महिलाओं के कार्यों पर ध्यान देते हुए यह देखना चाहिए कि उन्हें स्वच्छता अभियान से जोड़ने, उचित पारिश्रमिक दिलाने या किसी उपयुक्त सहायता योजना का लाभ पहुंचाने की क्या संभावनाएं हैं।

रज्जो को मेरा सलाम है। वह केवल अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए मेहनत नहीं कर रहीं, बल्कि अपने मोहल्ले को स्वच्छ रखने में भी योगदान दे रही हैं। उनकी कहानी एक सीधा संदेश देती है—जब सिर पर जिम्मेदारियों का बोझ हो, तो हार मानना विकल्प नहीं होता। मेहनत ही वह रास्ता है, जो इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देता है।

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