उत्तराखण्ड
गुरु के नाम पर संस्थाएं विवादों में, समाज कब करेगा आत्ममंथन

पद और अधिकार की लड़ाई से कहीं बड़ी है गुरु के नाम पर स्थापित संस्थाओं की मर्यादा और समाज के भविष्य की जिम्मेदारी
हल्द्वानी। हम सभी स्वयं को गुरु साहिबान की संगत का हिस्सा मानते हैं। प्रतिदिन गुरुघरों में माथा टेकते हैं, गुरबाणी सुनते हैं, सेवा करते हैं और गुरु साहिबान के बलिदानों को श्रद्धा से याद करते हैं। लेकिन आज समय हमसे केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि आत्ममंथन की मांग कर रहा है।।।सवाल यह है कि जिस गुरु के नाम पर संस्थाएं बनाई गईं, क्या उन संस्थाओं के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीर है। खालसा नेशनल स्कूल एवं श्री गुरु तेग बहादुर सीनियर स्कूल केवल ईंट-पत्थरों से बनी इमारतें नहीं हैं। ये समाज की धरोहर हैं, हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ी संस्थाएं हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनके परिसर में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश विराजमान है।
फिर सवाल उठता है—क्या ऐसी संस्था की सेवा-संभाल, सुरक्षा और मर्यादा के लिए समाज के पास पर्याप्त समय, व्यवस्था और जिम्मेदारी का भाव नहीं होना चाहिए?
आज यदि रात के समय किसी संस्था की देखभाल के लिए समाज के अपने लोग उपलब्ध नहीं हैं और बाहरी लोगों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, तो यह किसी एक व्यक्ति की कमी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए सोचने का विषय है। यदि वहां बीड़ी या तंबाकू के सेवन जैसी बातें सामने आती हैं, तो हमें किसी समुदाय विशेष को दोष देने से पहले स्वयं से पूछना चाहिए कि हम अपनी जिम्मेदारी कहां निभा रहे हैं?
गुरु के नाम पर संस्था—लेकिन संस्था की स्थिति क्या?
सबसे बड़ा सवाल उन लोगों से भी है जो इन संस्थाओं से जुड़े विवादों को लेकर न्यायालय तक पहुंचे हैं।
न्यायालय में अपने अधिकार और वैधानिक पक्ष को रखना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है। लेकिन क्या कभी हमने यह भी सोचा कि जब विवाद वर्षों तक चलता है तो उस दौरान संस्था का क्या होता है? बच्चों की शिक्षा का क्या होता है? संस्था की व्यवस्था का क्या होता है? और सबसे बढ़कर—गुरु के नाम की इस अमानत का क्या होता है?
क्या हमने कभी श्री गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान को स्मरण करते हुए स्वयं से यह प्रश्न किया है कि गुरु साहिब ने समाज को जोड़ने और मानवता की रक्षा के लिए अपना शीश दे दिया था, तो क्या उनके नाम पर बनी संस्थाओं को पद, अधिकार और आपसी वर्चस्व की लड़ाई में उलझाए रखना उनकी शिक्षाओं के अनुरूप है?
पद बड़ा है या गुरु का नाम?समाज को यह प्रश्न स्वयं से पूछना होगा—
क्या पद इतना बड़ा हो गया है कि गुरु का नाम पीछे छूट जाए?
क्या अधिकार की लड़ाई इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि संस्था का भविष्य ही विचाराधीन रह जाए?
क्या हम गुरु के नाम पर संस्था इसलिए चलाते हैं कि समाज की नई पीढ़ी को शिक्षा, संस्कार और दिशा मिले, या इसलिए कि संस्था के पद और अधिकार को लेकर संघर्ष चलता रहे?
इन सवालों का जवाब किसी एक व्यक्ति के पास नहीं है। इनका जवाब पूरे समाज को मिलकर देना होगा। गुरुओं की शहादत केवल स्मरण करने के लिए नहीं, सीखने के लिए है ।श्री गुरु तेग बहादुर जी का जीवन हमें सिद्धांतों पर अडिग रहने, मानवता की रक्षा करने और अन्याय के सामने न झुकने की प्रेरणा देता है। यदि हम हर वर्ष गुरु साहिबान के प्रकाश पर्व और शहादत दिवस पर बड़े-बड़े कार्यक्रम करते हैं, लेकिन उनके नाम पर चल रही संस्थाओं की व्यवस्था को लेकर उदासीन रहते हैं, तो हमें अपने धार्मिक आचरण और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच के अंतर पर विचार करना होगा।
गुरु की शहादत केवल मंचों से बोलने का विषय नहीं है—वह हमारे आचरण में दिखाई देनी चाहिए।
समाज को आपसी बैर नहीं, एकता चाहिए आज सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि हमारा समाज आपसी मतभेदों में उलझता जा रहा है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने, आरोप लगाने और अपने-अपने पक्ष को सही साबित करने में हम इतनी ऊर्जा लगा रहे हैं कि समाज की वास्तविक समस्याएं पीछे छूट रही हैं।
यदि कोई व्यक्ति समाजहित में कोई अच्छा कार्य करना चाहता है तो उसका सहयोग करने के बजाय उसके रास्ते में अड़चनें पैदा करना किस दिशा में ले जा रहा है?
हमें यह समझना होगा कि व्यक्ति से बड़ी संस्था है और संस्था से भी बड़ी गुरु की मर्यादा।
दूसरों को लंगर खिलाने के साथ अपने समाज की भी चिंता करें
हमारी सिख परंपरा पूरी मानवता की सेवा करना सिखाती है। जरूरतमंदों को लंगर खिलाना और हर धर्म के व्यक्ति की सेवा करना हमारी गौरवशाली परंपरा है।
लेकिन इसके साथ यह भी हमारी जिम्मेदारी है कि अपने बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा की व्यवस्था हो, अपनी संस्थाएं मजबूत हों, गुरुओं के नाम पर स्थापित धरोहरों की उचित देखभाल हो और आने वाली पीढ़ी को अपनी विरासत एवं गुरमत से जोड़ा जाए।
दूसरों की सेवा करते हुए अपने घर की जिम्मेदारी भूल जाना भी आत्ममंथन का विषय है।
अब फैसला किसी व्यक्ति का नहीं, समाज की चेतना का होना चाहिए
आज जरूरत किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि व्यवस्था को ठीक करने की है। न्यायालय में चल रहे विवादों का समाधान कानून के अनुसार हो, लेकिन उसके साथ यह भी सुनिश्चित हो कि संस्था दिशाहीन न हो और उसका शैक्षणिक, सामाजिक एवं धार्मिक उद्देश्य प्रभावित न हो।
समाज को चाहिए कि वह एकजुट होकर ऐसी संस्थाओं की व्यवस्था, सुरक्षा, पारदर्शिता और भविष्य पर गंभीर चर्चा करे।
गुरु के नाम पर बनी संस्था किसी पदाधिकारी की जागीर नहीं, समाज की अमानत है।
और आखिर में एक सवाल हम सभी के सामने है—
हम गुरु साहिबान के बलिदानों को केवल याद कर रहे हैं, या उनके आदर्शों को अपने जीवन और अपनी संस्थाओं में उतार भी रहे हैं?
यदि आज हम इस सवाल का जवाब ईमानदारी से तलाश लें, तो शायद हमारे बहुत से सामाजिक विवादों का रास्ता स्वयं स्पष्ट हो जाए। आइए, पद से ऊपर गुरु को रखें। व्यक्ति से ऊपर संस्था को रखें। विवाद से ऊपर समाज को रखें। और सबसे ऊपर गुरु साहिबान की मर्यादा एवं शिक्षाओं को रखें।
वाहेगुरु जी का खालसा।।वाहेगुरु जी की फतेह।

















