उत्तराखण्ड
आम आदमी के आशियाने पर कानून की सख्ती, बड़े निर्माणों पर सवाल; प्राधिकरण की कार्रवाई से उठे न्याय के समान मापदंड पर सवाल

हल्द्वानी/नैनीताल। जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण के एक आदेश ने भवन निर्माण और कानून के समान अनुपालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आदेश में कहा गया है कि संबंधित भवन में प्रथम तल पर परिवर्तित एवं परिवर्धित कर लगाए गए शटर, द्वितीय तल पर किए गए व्यावसायिक निर्माण तथा तृतीय तल पर आंशिक रूप से किए गए निर्माण को प्राधिकरण द्वारा ध्वस्त किया जा चुका है। इसके बाद प्राधिकरण ने संबंधित वाद की कार्यवाही समाप्त किए जाने का उल्लेख किया है।
आदेश में यह भी कहा गया है कि भवन स्वामी द्वारा मरम्मत की अनुमति के संबंध में किए गए अनुरोध पर उत्तराखंड भवन निर्माण एवं विकास उपविधि-2019 (संशोधन यथाविधि) के प्रावधानों के तहत सक्षम अधिकारी को सूचना देकर भवन में मरम्मत आदि का कार्य किया जा सकता है।
सवाल यह कि नियम सबके लिए बराबर हैं या नहीं?
मामला केवल एक भवन को लेकर नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की परेशानी से जुड़ा है जो अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर परिवार के रहने के लिए छोटा-सा मकान बनाता है। दूसरी ओर बड़े भू-स्वामियों अथवा व्यावसायिक निर्माणों में नियमों के अनुपालन, अनुमति और कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर आम जनता के मन में अक्सर सवाल उठते रहे हैं।
यह आदेश ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो जाता है जब आम नागरिक भवन निर्माण के लिए नक्शा पास कराने, अनुमति लेने और विभिन्न विभागीय औपचारिकताएं पूरी करने में लंबी प्रक्रिया से गुजरता है। यदि निर्माण नियमों के विपरीत पाया जाता है तो कार्रवाई होना कानून का हिस्सा है, लेकिन कार्रवाई का पैमाना और प्रक्रिया छोटे-बड़े सभी निर्माणकर्ताओं के लिए समान होनी चाहिए।
रहने के लिए मकान बनाने वाला कहां जाए?
आम परिवार के लिए अपना घर बनाना कोई व्यावसायिक परियोजना नहीं होता। वर्षों की बचत, बैंक ऋण और परिवार की जरूरतों के बीच बनाया गया मकान ही उसका सबसे बड़ा सहारा होता है। ऐसे में निर्माण संबंधी तकनीकी या स्वीकृति संबंधी कमी पाए जाने पर सीधे ध्वस्तीकरण की कार्रवाई परिवार को आर्थिक और मानसिक संकट में डाल सकती है।
वहीं व्यावसायिक निर्माण में नियमों के उल्लंघन के मामलों में भी यदि कार्रवाई होती है तो उसकी पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक और पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि किसी को यह महसूस न हो कि कानून की मार केवल उस व्यक्ति तक पहुंच रही है जिसके पास अपना पक्ष मजबूती से रखने के साधन नहीं हैं।
प्राधिकरण से उठ रही पारदर्शिता की मांग
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्राधिकरण ने जिन निर्माणों को अवैध मानकर ध्वस्त किया, उनकी स्वीकृति, निरीक्षण और कार्रवाई की प्रक्रिया क्या थी? साथ ही शहर में इसी प्रकार के अन्य निर्माणों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई है, इसका भी सार्वजनिक विवरण सामने आना चाहिए।
आम जनता की मांग है कि विकास प्राधिकरण बड़े व्यावसायिक निर्माण और सामान्य नागरिक के आवासीय निर्माण—दोनों पर एक समान नियम और समान प्रक्रिया लागू करने का स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करे। इससे न केवल प्राधिकरण की कार्रवाई पर भरोसा बढ़ेगा, बल्कि यह संदेश भी जाएगा कि कानून व्यक्ति की आर्थिक स्थिति या निर्माण के आकार को देखकर नहीं, बल्कि निर्धारित नियमों के आधार पर लागू होता है।

















