उत्तराखण्ड
उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित
‘उषा किरण खान का साहित्य भारतीय समाज, लोक संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज’

उद्घाटन सत्र में साहित्य अकादमी के सचिव वरुण गुलाटी ने कहा कि उषा किरण खान की रचनाएँ लोक संस्कृति, महिला सशक्तिकरण और भारतीय समाज की जड़ों से गहरे जुड़ाव का सशक्त उदाहरण हैं। साहित्य अकादमी के हिंदी परामर्श मंडल के सदस्य प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि यह परिसंवाद उत्तर भारत के पाठकों को उषा किरण खान के समृद्ध साहित्य से परिचित कराने का महत्वपूर्ण अवसर है।
प्रख्यात साहित्यकार प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि उषा किरण खान का साहित्य सामाजिक उत्तरदायित्व, मानवीय संवेदनाओं और भारतीय जीवन मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है।
मुख्य अतिथि, साहित्य अकादमी की उपाध्यक्ष एवं महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा को समझने के लिए उषा किरण खान की कृतियाँ ‘दूबजान’ और ‘भामती’ का अध्ययन आवश्यक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी ने कहा कि उषा किरण खान के साहित्य में भारतीय समाज की ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और क्षेत्रीय अस्मिता का सशक्त प्रतिबिंब दिखाई देता है। उन्होंने कार्यक्रम संयोजक डॉ. शशांक शुक्ल को सफल आयोजन के लिए बधाई देते हुए विश्वविद्यालय में शीघ्र ही विदेशी एवं क्षेत्रीय भाषाओं के नए पाठ्यक्रम शुरू किए जाने की जानकारी भी दी। उद्घाटन सत्र का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शशांक शुक्ल ने किया।
दो तकनीकी सत्रों में हुआ साहित्यिक विमर्श
प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. सविता मोहन ने की। उन्होंने उषा किरण खान के साहित्य में महिला जीवन-संघर्ष और सांप्रदायिक सह-अस्तित्व पर अपने विचार रखे। प्रो. सुशील उपाध्याय ने उनकी रचनाओं के मनोवैज्ञानिक पक्ष तथा ‘एक है जानकी’ में सीता के नवीन चित्रण पर चर्चा की। प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने आर्थिक संघर्ष, पलायन और उत्तर-औद्योगीकरण के संदर्भ में उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता रेखांकित की, जबकि प्रो. कुमार वरुण ने लोक संस्कृति, ऐतिहासिक दृष्टि और ‘गई संस्कृति टूट’ जैसी कृतियों के माध्यम से उनके साहित्य की विशिष्टता पर प्रकाश डाला। सत्र का संचालन डॉ. अनिल कार्की तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राजेंद्र कैड़ा ने किया।
द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. रमा (हंसराज कॉलेज) ने की। प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने उषा किरण खान को महिलाओं के संघर्ष और लोकजीवन की सशक्त दस्तावेज़कार बताते हुए ‘डूब-धान’ के माध्यम से भाषाओं के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. स्वाति चौधरी ने लेखिका के जीवन, पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनकी सशक्त स्त्री पात्रों का विश्लेषण प्रस्तुत किया। अध्यक्षीय टिप्पणी में प्रो. रमा ने कहा कि उषा किरण खान लोक संस्कृति की सजग संरक्षक हैं और उनका साहित्य आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है।
समापन वक्तव्य में प्रो. देव सिंह पोखरिया ने ऐसे साहित्यिक आयोजनों की निरंतरता पर बल देते हुए आयोजकों का आभार व्यक्त किया। द्वितीय सत्र का संचालन सुश्री पुष्पा बुडलाकोटी ने किया।
कार्यक्रम के दौरान सभी अतिथियों का स्वागत शॉल, ऐपण चित्रकारी एवं पौधे भेंट कर किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विद्याशाखाओं के निदेशक, शिक्षक, शिक्षणेत्तर कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
