उत्तराखण्ड
आंतरिक स्वतंत्रता और ब्रह्मज्ञान के संदेश संग मनाया गया मुक्ति पर्व


मन के बंधनों से आजादी ही वास्तविक मुक्ति: सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज
हल्द्वानी, 15 अगस्त 2026। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जहां देशभर में राष्ट्रभक्ति और उल्लास का वातावरण रहा, वहीं संत निरंकारी मिशन की ओर से ब्रह्मज्ञान के माध्यम से आंतरिक स्वतंत्रता का संदेश भी दिया गया। इसी क्रम में संत निरंकारी सत्संग भवन, गौजाजाली, बरेली रोड, हल्द्वानी में मुक्ति पर्व के अवसर पर विशाल सत्संग का आयोजन किया गया। सत्संग को रुद्रपुर ब्रांच के प्रचारक महात्मा पी.डी. जोशी ने संबोधित किया।
मुक्ति पर्व के अवसर पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में दिल्ली स्थित निरंकारी सरोवर के समक्ष भी विशेष आयोजन हुआ। इस अवसर पर देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालुओं ने सतगुरु के दर्शन और आध्यात्मिक संदेश का लाभ प्राप्त किया।
सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने अपने संदेश में कहा कि सच्ची मुक्ति केवल बाहरी बंधनों से आजादी का नाम नहीं है, बल्कि नफरत, अहंकार, छोटी सोच और पूर्वाग्रहों से मुक्त होना ही वास्तविक मुक्ति है। हर सांस में निराकार परमात्मा का एहसास रखते हुए प्रेम, भक्ति और स्वीकार्यता के साथ जीवन जीना ही जीते-जी मुक्ति का मार्ग है।
उन्होंने माता सविंदर जी के जीवन से प्रेरणा लेते हुए ‘लाइट हाउस’ का उदाहरण दिया और कहा कि परिस्थितियां कैसी भी हों, मनुष्य को अपने भीतर शांति, प्रेम और सकारात्मकता की रोशनी सदैव बनाए रखनी चाहिए। संतों की शिक्षाओं को केवल सुनना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें अपने विचारों, कर्मों और जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है।
इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने उन महान संत विभूतियों को श्रद्धापूर्वक नमन किया, जिनके त्याग, समर्पण और मानवता की सेवा ने लोगों को आध्यात्मिक मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। मिशन की विभिन्न शाखाओं में भी मुक्ति पर्व के अवसर पर विशेष सत्संग आयोजित किए गए।
उल्लेखनीय है कि मुक्ति पर्व का आरंभ वर्ष 1964 में जगत माता बुद्धवंती जी की पावन स्मृति में हुआ था। वर्ष 1969 में शहनशाह बाबा अवतार सिंह जी के ब्रह्मलीन होने के बाद यह दिवस ‘शहनशाह-जगतमाता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। वर्ष 1979 में संत निरंकारी मंडल के प्रथम प्रधान संत लाभ सिंह जी की स्मृति को भी इससे जोड़ते हुए बाबा गुरबचन सिंह जी ने इसे ‘मुक्ति पर्व’ के रूप में स्थापित किया।
वर्ष 2018 से युगनिर्माता माता सविंदर जी को भी इस पावन अवसर पर श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है। उनका वात्सल्य, विनम्रता, त्याग और निष्काम सेवा से परिपूर्ण जीवन श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। इस अवसर को उन समर्पित भक्तों और सेवादारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के रूप में भी मनाया जाता है, जिन्होंने अपना तन, मन और जीवन निःस्वार्थ भाव से मिशन एवं मानवता की सेवा में समर्पित किया।
मुक्ति पर्व का मूल संदेश यही है कि जिस प्रकार भौतिक स्वतंत्रता राष्ट्र की प्रगति और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान की दिव्य ज्योति मनुष्य को अपनी वास्तविक पहचान का बोध कराकर प्रेम, सद्भाव और मानवता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।














