उत्तराखण्ड
प्रकृति संरक्षण दिवस पर अपील — दाह संस्कार में बिजली शमन अपनाने से बचेंगे लाखों वृक्ष”:


हल्द्वानी,,,स्थानीय संगठन व सामाजिक कार्यकर्ता मंत्रालय से आग्रह करते हुए कहते हैं कि वसीयत-आधार पर इलेक्ट्रिक क्रेमेशन केंद्र स्थापित करने की रूपरेखा लागू की जाए इस दौरान विगत 28 जुलाई को प्रकृति संरक्षण दिवस मनाया गया ,जिसको लेकर विश्व में हजारों पेड़ लगाए गए लेकिन इसके विपरीत हर वर्ष लाखों पेड़ो का दोहन होता है स्थानीय पर्यावरण संरक्षक और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आज सरकार तथा जिला प्रशासन से अपील की कि पारंपरिक लकड़ी-आधारित दाह संस्कार की जगह बिजली शमन (इलेक्ट्रिक क्रेमेशन) जैसी ऊर्जा-आधारित वैकल्पिक विधियों को तेज़ी से अपनाया जाए। उनका कहना है कि इस परिवर्तन से देश भर में वृक्षों के अनावश्यक दोहन में भारी कमी लाई जा सकती है।
आयोजकों ने बताया कि परम्परागत विधियों में एक ही अंतिम संस्कार के लिए कई कुंतल लकड़ी की खपत होती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव वनों व स्थानीय पारिस्थितिकी पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि सिर्फ वृक्षारोपण पर भरोसा पर्याप्त नहीं है; लकड़ी की मांग घटाने के वैकल्पिक साधनों पर काम करना ज़रूरी है।
प्रस्तावित योजना में 50 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को उनकी वसीयत में इलेक्ट्रिक क्रेमेशन को प्राथमिकता देने का विकल्प देने की बात शामिल है। इससे तहसील स्तर पर वसीयत-रजिस्ट्रेशन सहित प्रशासनिक रिकॉर्ड बनेंगे और राज्य-स्तर पर 5–10 किलोमीटर की दूरी पर सामुदायिक इलेक्ट्रिक क्रेमेटर केंद्र स्थापित करने का नेटवर्क बनाया जा सकेगा, जिससे पहुँच और लागत दोनों नियंत्रित रह सकें।
स्थानीय पर्यावरणविद् रणबीर सिंह ने कहा, “यह केवल सांस्कृतिक बदलाव का मुद्दा नहीं है — यह जीविका, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का सवाल है। यदि पायलट परियोजनाओं में सफलता मिली तो यह मॉडल देशव्यापी रूप से प्रेरणादायक साबित होगा।”
आयोजकों ने प्रशासन से आग्रह किया है कि:इलेक्ट्रिक क्रेमेशन केंद्रों के लिए पायलट परियोजनाएँ शुरू की जाएँ;
इन केंद्रों पर सब्सिडी व संचालन हेतु स्थानीय-शासकीय भागीदारी सुनिश्चित की जाए;।50+ आयु के लोगों के लिए वसीयत-रजिस्ट्रेशन की आसान प्रक्रिया अपनाई जाए;
धार्मिक और सामुदायिक नेताओं के साथ संवाद कर सांस्कृतिक स्वीकृति बढ़ाई जाए।
जिला प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी से अपील की इस , पर विस्तृत आर्थिक अध्ययन तथा सामाजिक स्वीकृति पर काम आवश्यक है। एवं पायलट प्रोजेक्ट और प्रभाव-आकलन के बाद ही बड़े स्तर पर कार्यान्वयन पर निर्णय लिया जाएगा।
स्थानीय समुदायों ने इस पहल को स्वागत योग्य बताया है, पर कुछ पारंपरिक परिवारों ने चिंता जताई कि धार्मिक रस्मों और श्रद्धा-भाव में बदलाव से उनकी संस्कृति प्रभावित हो सकती है। आयोजक इसे गंभीरता से लेते हुए सामुदायिक संवाद और धार्मिक नेताओं की भागीदारी के जरिए संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए परिवर्तन की योजना बना रहे हैं।
प्रकृति संरक्षण दिवस के मौके पर चलाए जा रहे कार्यक्रमों में वृक्षारोपण के साथ-साथ लकड़ी की खपत घटाने के विकल्पों पर कार्यशालाएँ और पैनल चर्चा भी आयोजित की गईं। आयोजकों का कहना है कि सतत विकल्पों को अपनाकर ही मानव सभ्यता व पर्यावरण दोनों का संरक्षण संभव है।


