उत्तराखण्ड
सनातन ज्ञान-परंपरा हमारी सभ्यता की आत्मा, संस्कृत और वैदिक ज्ञान के संरक्षण में आधुनिक तकनीक की अहम भूमिका





उज्जैन। भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा हमारी सभ्यता की आत्मा है। यह केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान को समृद्ध करने और भविष्य को दिशा देने वाली अमूल्य शक्ति है। इसी भावना के साथ उज्जैन स्थित महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा और वैदिक ज्ञान-परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान देने वाले विद्वानों का सम्मान किया गया।
कार्यक्रम में संस्कृत पांडुलिपियों के संरक्षण एवं डिजिटलीकरण, मंत्रों और श्लोकों के शुद्ध उच्चारण को सुरक्षित रखने तथा प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन और व्याख्या को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर विशेष जोर दिया गया। इस दिशा में आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा गया कि तकनीकी संसाधनों के प्रभावी उपयोग से भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उसे व्यापक स्तर पर नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।
इस अवसर पर उत्तराखण्ड और मध्य प्रदेश के बीच शिक्षा, संस्कृति एवं शोध के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय तथा दून विश्वविद्यालय के हिन्दू अध्ययन विभाग के बीच सहयोग से विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए अध्ययन, शोध एवं अकादमिक आदान-प्रदान के नए अवसर सृजित किए जाने की दिशा में प्रयास किए जाएंगे।
कार्यक्रम में ‘ज्ञान भारतम’ और ‘संस्कृत गौरव ग्रंथ व्याख्यान-माला’ जैसे प्रयासों को भारतीय ज्ञान-परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने की महत्वपूर्ण पहल बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, साहित्य, विज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक चिंतन की विशाल ज्ञान-परंपरा का महत्वपूर्ण आधार है।
आधुनिक तकनीक के साथ परंपरागत ज्ञान के समन्वय पर जोर देते हुए कहा गया कि पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण, वैदिक मंत्रों के उच्चारण का संरक्षण, प्राचीन ग्रंथों की वैज्ञानिक व्याख्या और शोधपरक अध्ययन के माध्यम से भारत की ज्ञान-संपदा को वैश्विक स्तर पर भी नई पहचान दिलाई जा सकती है।

















