उत्तराखण्ड
पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति पर घमासान, यूजीसी नियमों के उल्लंघन का आरोप

गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के कुलपति डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप की नियुक्ति को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। उत्तराखंड एकता मंच ने कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के वर्ष 2018 के विनियमों का उल्लंघन किए जाने का आरोप लगाते हुए पूरी चयन प्रक्रिया को निरस्त करने और नए सिरे से कुलपति की नियुक्ति कराने की मांग की है।
हल्द्वानी नगर निगम सभागार में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंच के संगठन प्रभारी डॉ. विक्रम सिंह माहोड़ी ने कहा कि 27 अप्रैल 2026 को डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप को विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया, लेकिन इस नियुक्ति के लिए गठित सर्च कमेटी और चयन प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि यूजीसी विनियम 2018 के नियम 7.3 के प्रावधानों के अनुसार कुलपति चयन के लिए गठित खोज सह चयन समिति में उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को शामिल किया जाना आवश्यक है। साथ ही समिति के सदस्यों का संबंधित विश्वविद्यालय या उसके महाविद्यालयों से किसी भी प्रकार का जुड़ाव नहीं होना चाहिए।
सर्च कमेटी में विश्वविद्यालय प्रबंधन परिषद के सदस्य को शामिल करने पर सवाल
मंच ने इस मामले में 13 अक्टूबर 2025 को जारी शासनादेश को महत्वपूर्ण आधार बताया है। शासनादेश के अनुसार कुलपति चयन के लिए गठित तीन सदस्यीय सर्च कमेटी में उत्तराखंड शासन के पूर्व मुख्य सचिव इंदु कुमार पांडे, पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार तथा विश्वविद्यालय की प्रबंधन परिषद के सदस्य डॉ. शैलेन्द्र मोहन सिंघल को शामिल किया गया था।
डॉ. माहोड़ी का आरोप है कि डॉ. शैलेन्द्र मोहन सिंघल का विश्वविद्यालय की प्रबंधन परिषद में सदस्य होना यूजीसी के निर्धारित प्रावधानों की निष्पक्षता संबंधी शर्तों पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सर्च कमेटी में यूजीसी अध्यक्ष द्वारा नामित सदस्य शामिल नहीं था। ऐसे में चयन समिति के गठन की वैधानिकता की जांच आवश्यक है।
30 अगस्त 2024 के शासनादेश से भी जोड़ा मामला
प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार 30 अगस्त 2024 को जारी शासनादेश में डॉ. शैलेन्द्र मोहन सिंघल को उत्तर प्रदेश कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय अधिनियम, 1958 की धारा 10 के अंतर्गत गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की प्रबंधन परिषद में प्रतिष्ठित उद्योगपति श्रेणी के सदस्य के रूप में नामित किया गया था। उनका कार्यकाल तीन वर्ष निर्धारित किया गया था।
इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को जारी शासनादेश में उन्हें कुलपति चयन के लिए गठित सर्च कमेटी का सदस्य बनाया गया। मंच का कहना है कि इन दोनों शासनादेशों को एक साथ देखने पर चयन समिति की निष्पक्षता और हितों के संभावित टकराव का प्रश्न उठता है।
यूजीसी नियमों में क्या है प्रावधान?
यूजीसी विनियम 2018 के खंड 7.3 के अनुसार कुलपति की नियुक्ति के लिए तीन से पांच सदस्यों की खोज सह चयन समिति गठित की जानी चाहिए। समिति के सदस्य उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिष्ठित व्यक्ति होने चाहिए तथा उनका संबंधित विश्वविद्यालय या उसके महाविद्यालयों से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं होना चाहिए।
नियमों में यह भी प्रावधान है कि समिति शैक्षणिक उत्कृष्टता, देश-विदेश की उच्चतर शिक्षा प्रणाली की जानकारी तथा शैक्षणिक और प्रशासनिक अभिशासन में पर्याप्त अनुभव के आधार पर योग्य व्यक्तियों का पैनल तैयार कर कुलाध्यक्ष अथवा कुलाधिपति को प्रस्तुत करेगी। राज्य विश्वविद्यालयों के कुलपति चयन के लिए समिति के एक सदस्य का नामांकन यूजीसी अध्यक्ष द्वारा किया जाना भी निर्धारित है। कुलपति की नियुक्ति इसी समिति द्वारा सुझाए गए पैनल में से कुलाधिपति द्वारा की जाती है।
पूर्व वित्तीय अनियमितताओं और आरोपों को समाप्त करने पर भी उठाए सवाल
डॉ. माहोड़ी ने आरोप लगाया कि डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप के विश्वविद्यालय में पूर्व कार्यकाल के दौरान वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े गंभीर आरोप लगे थे और विश्वविद्यालय की प्रबंधन परिषद की ओर से उनके विरुद्ध चार्जशीट भी दाखिल की गई थी। उन्होंने दावा किया कि इस प्रकरण में डॉ. शैलेन्द्र मोहन सिंघल ने डॉ. कश्यप के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया था।
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि 3 सितंबर 2026 को देहरादून में विश्वविद्यालय के प्रबंध बोर्ड की बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता डॉ. शैलेन्द्र मोहन सिंघल ने की और इसमें डॉ. कश्यप के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को समाप्त कर दिया गया। मंच ने इन घटनाओं को भी निष्पक्षता और संभावित हितों के टकराव के संदर्भ में जांच का विषय बताया।
हाईकोर्ट में दो वाद विचाराधीन होने का दावा
मंच के अनुसार विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद यह पहला अवसर है, जब किसी कुलपति की नियुक्ति को लेकर नैनीताल उच्च न्यायालय में दो वाद विचाराधीन हैं। हालांकि, इन मामलों में न्यायालय का अंतिम निर्णय अभी सामने नहीं आया है। मंच ने मांग की कि नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े सभी दस्तावेजों और शासनादेशों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
इसके अलावा विश्वविद्यालय की पूर्व प्रवेश प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए। आरोप लगाया गया कि प्रवेश के दौरान निर्धारित नियमों की अनदेखी करते हुए अधिक मेरिट वाले अभ्यर्थियों के स्थान पर कम मेरिट वाले अभ्यर्थियों को सीटें आवंटित की गईं। इस संबंध में मुख्यमंत्री से शिकायत किए जाने की बात भी कही गई।
सरकार से नियुक्ति निरस्त कर नए सिरे से प्रक्रिया अपनाने की मांग
डॉ. विक्रम सिंह माहोड़ी ने राज्य सरकार से मांग की कि कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि यूजीसी नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो नियुक्ति निरस्त कर निर्धारित नियमों के अनुरूप नए सिरे से चयन प्रक्रिया शुरू की जाए। उन्होंने यह भी मांग की कि नई नियुक्ति होने तक किसी अन्य योग्य व्यक्ति को कार्यवाहक कुलपति की जिम्मेदारी सौंपी जाए।
उन्होंने कहा कि पंतनगर विश्वविद्यालय प्रदेश का प्रतिष्ठित शैक्षणिक एवं कृषि अनुसंधान संस्थान है। ऐसे संस्थान में कुलपति की नियुक्ति पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और निर्धारित नियमों के अनुरूप होनी चाहिए, ताकि विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा और विश्वसनीयता बनी रहे।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में वरिष्ठ अधिवक्ता संजय राठौर, सेवानिवृत्त कैप्टन मानसिंह, प्रयाग जीना, दिनेश कर्नाटक, जमुना दत्त और अभिषेक सहित अन्य लोग मौजूद रहे।





