उत्तराखंड,एक राज्यपाल का कार्यकाल, अनेक संदेश: लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने उत्तराखंड को सिखाया जिम्मेदारी का वास्तविक अर्थ सीमांत गांव से लेकर राजधानी तक, मातृशक्ति के संघर्ष से लेकर सैनिकों के बलिदान तक, देवभूमि के हर व्यक्ति के महत्व को समझने की जो दृष्टि उन्होंने दी, वह उत्तराखंड की स्मृतियों में लंबे समय तक बनी रहनी चाहिए। उत्तराखंड के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल किसी संवैधानिक पद पर रहकर अपना कार्यकाल पूरा नहीं करते, बल्कि अपने विचारों, व्यवहार और दृष्टिकोण से समाज के सामने कई ऐसे प्रश्न छोड़ जाते हैं, जिन पर आने वाली पीढ़ियों को भी विचार करना चाहिए। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी का उत्तराखंड के राज्यपाल के रूप में कार्यकाल भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। राज्यपाल का पद केवल राजभवन की चारदीवारी तक सीमित नहीं होता। यह पद संविधान की मर्यादा, लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक संवेदनशीलता और राज्य के प्रत्येक नागरिक के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक है। इस जिम्मेदारी का वास्तविक अर्थ तभी सामने आता है, जब शासन और समाज की निगाह राज्य के अंतिम छोर पर रहने वाले उस व्यक्ति तक पहुंचे, जिसकी आवाज अक्सर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती। गुरमीत सिंह जी के सार्वजनिक संवाद और उत्तराखंड के प्रति उनके दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण संदेश उभरता है—किसी भी राज्य की पहचान केवल उसकी राजधानी, बड़े शहरों, पर्यटन स्थलों और विकास की चमक से नहीं होती, बल्कि उस दूरस्थ गांव में रहने वाले परिवार से भी होती है, जो कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में अपने जीवन और अपनी संस्कृति को बचाए हुए है। उत्तराखंड की असली पहचान उसके सीमांत गांव और वहां रहने वाले लोग हैंउत्तराखंड एक ऐसा राज्य है, जिसकी भौगोलिक परिस्थितियां देश के दूसरे राज्यों से अलग हैं। यहां ऊंचे पहाड़ हैं, दुर्गम रास्ते हैं, सीमावर्ती गांव हैं और ऐसे अनेक परिवार हैं, जो आज भी मूलभूत सुविधाओं की प्रतीक्षा में जीवन गुजार रहे हैं। पलायन इस प्रदेश की सबसे बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों में से एक है। ऐसे में गुरमीत सिंह जी ने अपने कार्यकाल के दौरान पलायन रोकने, सीमांत क्षेत्रों के विकास और गांवों को फिर से आबाद करने जैसे विषयों को प्राथमिकता दी। उन्होंने राज्य के 13 जिलों का दौरा किया और 51 चिन्हित वाइब्रेंट विलेज में से 30 गांवों तक पहुंचकर स्थानीय लोगों, युवाओं और पूर्व सैनिकों से संवाद किया। यह संदेश महत्वपूर्ण है कि देश की सीमा पर खड़ा अंतिम गांव भी राष्ट्र की मुख्यधारा का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है, जितना देश की राजधानी में रहने वाला नागरिक। India +1 उत्तराखंड के निर्माण में महिलाओं का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता उत्तराखंड की बात हो और यहां की मातृशक्ति का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है। इस राज्य की नींव में महिलाओं का संघर्ष, त्याग और अदम्य साहस शामिल है। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में महिलाओं ने जिस तरह सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया, वह इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। पहाड़ की महिलाओं ने केवल अपने परिवारों की जिम्मेदारी नहीं संभाली, बल्कि राज्य की पहचान, अधिकारों और सम्मान की लड़ाई में भी अग्रिम भूमिका निभाई।। आज भी पहाड़ की महिला सुबह से शाम तक खेतों, जंगलों, पशुपालन, बच्चों की शिक्षा और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच जीवन बिताती है। कई गांवों में पुरुष रोजगार के लिए बाहर चले जाते हैं और महिलाएं पूरे परिवार तथा गांव की अर्थव्यवस्था को संभालती हैं। ऐसे में महिलाओं का सशक्तीकरण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं होना चाहिए, बल्कि उत्तराखंड के विकास की मूल नीति का हिस्सा बनना चाहिए। गुरमीत सिंह जी ने अपने कार्यकाल में महिला सशक्तीकरण और बालिका शिक्षा को प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा। राजभवन में बालिकाओं के लिए आत्मरक्षा एवं कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना और महिलाओं को कानूनी जानकारी, वित्तीय साक्षरता तथा रोजगार संबंधी मार्गदर्शन देने के लिए गार्गी नारी शक्ति जैसी पहल इसी सोच का उदाहरण हैं। India +1 सैनिकों की भूमि उत्तराखंड को मिला विशेष सम्मान उत्तराखंड को वीरभूमि कहा जाता है। यहां के अनेक परिवारों का रिश्ता भारतीय सेना से जुड़ा है। पहाड़ का युवा देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपना घर छोड़ता है और कई बार तिरंगे में लिपटकर वापस आता है। एक सैनिक अधिकारी के रूप में लगभग चार दशक तक देश की सेवा करने वाले गुरमीत सिंह जी ने उत्तराखंड के सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों की समस्याओं को समझने का प्रयास किया। पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों की शिकायतों के समाधान के लिए राजभवन में व्यवस्था विकसित करना भी इसी संवेदनशीलता का हिस्सा रहा। India +1यह आवश्यक है कि सैनिकों के सम्मान की बातें केवल राष्ट्रीय पर्वों और समारोहों तक सीमित न रहें। उनके परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की सुविधाएं मिलना भी उतना ही जरूरी है। शिक्षा, तकनीक और युवाओं के भविष्य पर जोर.किसी भी प्रदेश का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के हाथों में होता है। उत्तराखंड के युवाओं में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन अवसरों की कमी के कारण उन्हें दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ता है।गुरमीत सिंह जी ने उच्च शिक्षा में शोध, नवाचार, पारदर्शिता और तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, विश्वविद्यालयों के बीच समन्वय और युवाओं को रोजगारपरक कौशल से जोड़ने की पहल इसी दिशा में उठाए गए कदमों में शामिल रही।=उनकी पांच प्रमुख प्राथमिकताओं में रिवर्स माइग्रेशन, महिला सशक्तीकरण, बालिका शिक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं तकनीक, जैविक खेती और वेलनेस शामिल रहे। India +1लेकिन आने वाले समय में इन प्रयासों की असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब पहाड़ का युवा अपने ही गांव में रोजगार प्राप्त कर सके, किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले और गांवों में शिक्षा तथा स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हों। राज्यपाल का पद एक जिम्मेदारी है, अधिकारों का प्रदर्शन नहीं गुरमीत सिंह जी के कार्यकाल से एक बात पर विशेष रूप से विचार करने की आवश्यकता है। संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति केवल औपचारिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकता। उसकी भूमिका समाज के अलग-अलग वर्गों की बात सुनने, संस्थाओं को प्रोत्साहित करने और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादा बनाए रखने में भी होती है। राज्यपाल के रूप में उनका पांच वर्ष का कार्यकाल 15 सितंबर 2021 से 18 अक्टूबर 2026 तक रहा। इस दौरान उन्होंने राजभवन को शिक्षा, तकनीक, पर्यावरण, स्वास्थ्य और जनसंवाद से जुड़े कई कार्यक्रमों का केंद्र बनाने की दिशा में काम किया। India +1 यहां सवाल किसी व्यक्ति की प्रशंसा या आलोचना का नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी की समझ का है, जो किसी संवैधानिक पद के साथ जुड़ी होती है। अब उत्तराखंड को इस संदेश को आगे बढ़ाना होगा आज जब गुरमीत सिंह जी राज्यपाल के पद से विदा हो चुके हैं, तब उत्तराखंड के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल है—क्या उनके कार्यकाल में उठाए गए विषयों को आगे भी उसी गंभीरता से प्राथमिकता दी जाएगी? क्या सीमांत गांवों की समस्याएं शासन की प्राथमिकता रहेंगी? क्या राज्य आंदोलन में अपनी जवानी खपाने वाली महिलाओं को वास्तविक सम्मान और आर्थिक आत्मनिर्भरता मिलेगी? क्या पलायन करने वाले युवाओं को अपने गांव लौटने का अवसर मिलेगा? क्या पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों की समस्याओं का स्थायी समाधान होगा? इन सवालों का जवाब किसी एक राज्यपाल, मुख्यमंत्री या सरकार के पास नहीं, बल्कि पूरे शासनतंत्र और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी में छिपा है। गुरमीत सिंह जी, उत्तराखंड की ओर से आपका आभार। आपका पांच वर्ष का कार्यकाल समाप्त हो गया है, लेकिन आपके कार्यकाल में जिन विषयों को प्राथमिकता मिली, वे उत्तराखंड के भविष्य से जुड़े विषय हैं। किसी राज्य का विकास तभी सार्थक होता है, जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। जब पहाड़ की बेटी को शिक्षा मिले, जब गांव की महिला आत्मनिर्भर बने, जब सीमांत क्षेत्र का युवा अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त हो और जब सैनिक का परिवार स्वयं को सम्मानित एवं सुरक्षित महसूस करे।
देवभूमि उत्तराखंड केवल चारधाम, मंदिरों, नदियों और पहाड़ों का नाम नहीं है। यह उन माताओं का प्रदेश है, जिन्होंने अपने बेटों को देश की रक्षा के लिए भेजा है। यह उन महिलाओं की भूमि है, जिन्होंने राज्य निर्माण के लिए संघर्ष किया। यह उन किसानों का प्रदेश है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपनी मिट्टी से जुड़े हैं। यह उन युवाओं का प्रदेश है, जिनके सपनों में आज भी अपने पहाड़ को आगे बढ़ाने की इच्छा जीवित है।किसी भी पद की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके कार्यकाल की अवधि नहीं, बल्कि उसके माध्यम से समाज में छोड़ा गया सकारात्मक संदेश होता है।गुरमीत सिंह जी के कार्यकाल से उत्तराखंड को यही संदेश ग्रहण करना चाहिए कि जिम्मेदारी का वास्तविक अर्थ अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचना और उसकी आवाज को महत्व देना है।देवभूमि की यही पहचान है, यही इसकी आत्मा है और यही उत्तराखंड के उज्ज्वल भविष्य का आधार होना चाहिए।