उत्तराखण्ड
वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. बी.एस. कालाकोटी की पुस्तक ‘Glossary of Commercial Herbs of Uttarakhand’ का विमोचन



कार्यक्रम का संचालन प्रो. ललित तिवारी, विभागाध्यक्ष वनस्पति विज्ञान, नैनीताल द्वारा किया गया। इस अवसर पर उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी के पर्यावरण विभागाध्यक्ष डॉ. हरिश जोशी द्वारा पुस्तक विमोचन के साथ वृक्षारोपण कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम में करीब 50 शिक्षाविदों एवं विषय विशेषज्ञों ने प्रतिभाग किया।
पुस्तक के संबंध में वक्ताओं ने कहा कि ‘Glossary of Commercial Herbs of Uttarakhand’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की प्राकृतिक एवं जैविक संपदा के संरक्षण, औषधीय पादपों के वैज्ञानिक उपयोग तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। उत्तराखण्ड प्राकृतिक रूप से औषधीय एवं सुगंधित पौधों का समृद्ध भंडार है। यहां पाई जाने वाली अनेक बहुमूल्य जड़ी-बूटियों का उपयोग औषधि, आयुर्वेद, न्यूट्रिशन, खाद्य एवं हर्बल उद्योगों में व्यापक रूप से किया जाता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि यदि राज्य में इन वनस्पतियों का वैज्ञानिक तरीके से कृषिकरण और व्यावसायिक उत्पादन किया जाए तो स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पलायन को रोकने में भी मदद मिलेगी। वहीं, इन बहुमूल्य औषधीय वनस्पतियों का देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में निर्यात किए जाने की संभावनाएं भी उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था को नई गति प्रदान कर सकती हैं।
पुस्तक में उत्तराखण्ड में पाई जाने वाली व्यावसायिक औषधीय वनस्पतियों की पहचान, उनकी उपयोगिता तथा वैज्ञानिक जानकारी को सरल एवं व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। यही कारण है कि यह पुस्तक वन विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों, वनस्पति विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों, रसायनविदों, आयुर्वेद विशेषज्ञों, फार्माकोलॉजिस्ट तथा औषधीय उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के लिए उपयोगी संदर्भ सामग्री के रूप में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
वक्ताओं ने कहा कि डॉ. बी.एस. कालाकोटी एवं डॉ. गरिमा मटेला ने इस महत्वपूर्ण कृति के माध्यम से उत्तराखण्ड की प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और उसके सतत उपयोग की दिशा में उल्लेखनीय योगदान दिया है। यह पुस्तक राज्य की जैव विविधता को समझने के साथ-साथ उसके आर्थिक एवं औषधीय महत्व को व्यापक स्तर पर सामने लाने का प्रयास है।
कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षाविदों ने दोनों लेखकों को इस महत्वपूर्ण कृति के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि इस प्रकार के वैज्ञानिक प्रयास उत्तराखण्ड की जैव विविधता को संरक्षित करने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों को प्रकृति आधारित आजीविका से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।



