उत्तराखण्ड
ममता की स्याही से लिखा सफलता का इतिहास: जहाँ बेटे की आँखें थमीं, वहाँ से माँ ने बुना IAS का ख्वाब
अजय सिंह – वरिष्ठ संवाददाता
दिल को हिला देने वाली और डेडीकेशन की एक ऐसी दास्तान जो आपको झकझोर रख देगी ।
कुछ कहानियां सिर्फ सफलता की नहीं होतीं, वे इंसानी जज्बे और मां की अटूट ममता के उस गठजोड़ की दास्तान होती हैं, जिसे देखकर किस्मत भी अपना लिखा बदलने पर मजबूर हो जाती है। बिहार के नवादा जिले के एक बेहद साधारण से गांव माहुली के रहने वाले रवि राज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
90% तक आंखों की रोशनी खो देने के बाद भी रवि ने हार नहीं मानी और यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक (AIR) 20 हासिल कर देश को चौंका दिया। लेकिन इस ऐतिहासिक कामयाबी की पटकथा रवि ने अकेले नहीं, बल्कि अपनी मां के साथ मिलकर लिखी है। यह कहानी एक ऐसे बेटे की है जिसके पास आंखें नहीं थीं, और एक ऐसी मां की है जो अपने बेटे का सबसे खूबसूरत ख्वाब बन गई।
जब दुनिया धुंधली हुई, तो मां ने संभाली कमान
रवि राज बचपन से इस चुनौती के साथ पैदा नहीं हुए थे। जब वह अपनी स्कूली शिक्षा के दौर में थे, तभी उनके जीवन में रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा (Retinitis Pigmentosa) नाम की एक लाइलाज बीमारी ने दस्तक दी। धीरे-धीरे आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और एक वक्त ऐसा आया जब किताबों के अक्षर पूरी तरह ओझल हो गए।
एक आम छात्र शायद यहीं हिम्मत हार जाता, लेकिन रवि के घर में एक ऐसी ताकत थी जिसने उनके सपनों को कभी अंधकार में डूबने नहीं दिया—उनकी मां विभा सिन्हा।
साझे सफर की अनोखी दास्तान जब रवि किताबों को देख नहीं सकते थे, तो उनकी मां उनकी आंखें बन गईं। विभा जी ने दिन-रात रवि के लिए भारी-भरकम प्रशासनिक और इतिहास की किताबों को खुद पढ़-पढ़कर सुनाना शुरू किया। रसोई में खाना बनाने से लेकर घर के रोजमर्रा के कामों के बीच, विभा जी की आवाज रवि के कमरों में गूंजती रहती थी। रवि सुनते थे, समझते थे और मां उन विचारों को कागज़ पर नोट्स के रूप में उतार देती थीं।
लगातार खुद को बेहतर बनाने का जुनून
यह रवि के अटूट आत्म-विश्वास का ही नतीजा था कि उन्होंने कभी भी किसी एक छोटी सफलता पर रुकना मंजूर नहीं किया। उनके पिता रंजन कुमार सिन्हा एक किसान हैं, जिन्होंने तंगहाली के बावजूद कभी बेटे के हौसले पर आंच नहीं आने दी। रवि के इस सफर के पड़ाव उनकी मेहनत की गवाही देते हैं:
पहला पड़ाव (BPSC): उन्होंने बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 490वीं रैंक हासिल की। राजस्व अधिकारी (Revenue Officer) का पद मिला, लेकिन आईएएस (IAS) बनने की चाह में उन्होंने इस सुरक्षित नौकरी को जॉइन नहीं किया।
दूसरा पड़ाव (UPSC – पहला प्रयास): उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में 182वीं रैंक हासिल की। सफलता मिल चुकी थी, लेकिन देश के टॉप ब्यूरोक्रेट्स में शामिल होने का सपना अभी बाकी था।
मंजिल (UPSC – दूसरा प्रयास): अपनी कमियों को सुधारते हुए उन्होंने अंततः ऑल इंडिया रैंक 20 पर कब्जा कर अपनी जिद को पूरा किया।
मां पढ़ाती नहीं, मां तो खेलती है…’
इस सफलता के बाद जब मां विभा सिन्हा से पूछा गया कि उन्होंने अपने बेटे को इतनी कठिन परीक्षा के लिए कैसे तैयार किया, तो उनका जवाब हर मां के दिल को छू लेने वाला था:
“लोग कहते हैं कि मैंने उसे पढ़ाया, पर यह सच नहीं है। मां भला कभी पढ़ाती है? मां तो अपने बच्चे के साथ खेलती है। कुछ माता-पिता अपने बच्चों को खिलौने देते हैं, मैंने उसके हाथों में किताबें थमा दीं। हम सालों तक बस उन किताबों के साथ खेलते रहे… और इसी खेल का नतीजा है कि मेरा बच्चा आज इस मुकाम पर है।”
रवि राज की भावी उम्मीदवारों को सीख

मानसिक दृढ़ता सबसे बड़ा हथियार: शारीरिक अक्षमता आपको तब तक नहीं हरा सकती, जब तक आपका दिमाग हार स्वीकार न कर ले। अपनी बंद आंखों में इतनी मजबूत कल्पना शक्ति (imagination) पैदा कीजिए कि हर कॉन्सेप्ट आपके दिमाग में बिल्कुल साफ हो।
स्क्राइब (Scribe) के साथ तालमेल: मुख्य परीक्षा में आपका लिखा जाना आपके स्क्राइब की गति और समझ पर निर्भर करता है। इसलिए परीक्षा से महीनों पहले एक अच्छे स्क्राइब के साथ मॉक टेस्ट लिखना और आपसी समझ को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
सहानुभूति नहीं, सम्मान चाहिए: समाज अक्सर दिव्यांग लोगों को दया की नजर से देखता है। रवि का मानना है कि हमें दया की नहीं, बल्कि खुद को साबित करने के लिए समान अवसरों की जरूरत है।
रवि राज और उनकी मां विभा सिन्हा की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जब इरादे चट्टान जैसे हों और साथ मां की दुआओं का हो, तो दुनिया की कोई भी रुकावट आपकी उड़ान को सीमित नहीं कर सकती।
