उत्तराखण्ड
पर्वतीय संस्कृति और पर्यावरण संदेश के साथ पांच दिवसीय हरेला मेला 12 जुलाई से

मंच के संरक्षक हुकुम सिंह कुंवर और अध्यक्ष खड़ग सिंह बगड़वाल ने कहा कि हरेला केवल पर्व नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते पर्यावरणीय संकट के इस दौर में हरेला का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक है और यह लोगों को पौधारोपण, जल स्रोतों के संरक्षण तथा स्वच्छ पर्यावरण के प्रति प्रेरित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि मेला नई पीढ़ी को लोकसंस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का सशक्त माध्यम है।
कार्यक्रम विवरण:
12 जुलाई: मेले का शुभारंभ गोल्ज्यू देवता के पूजन व संस्कार गीतों से। 6–13 वर्ष आयु वर्ग की एकल लोकगीत प्रतियोगिता, कनिष्ठ वर्ग की समूह लोकनृत्य प्रतियोगिता तथा मुख्य मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम।
13 जुलाई: चार आयु वर्गों में कुर्सी दौड़; सांस्कृतिक प्रस्तुतियां।
14 जुलाई: चम्मच दौड़, कुमाऊंनी संस्कृति पर आधारित फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता, कनिष्ठ वर्ग की सुगम गायन प्रतियोगिता तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम।
15 जुलाई: जलेबी दौड़, हरेला पर्व विषय पर कुमाऊंनी भाषण प्रतियोगिता, 14–18 वर्ष आयु वर्ग की सुगम गायन प्रतियोगिता तथा सांस्कृतिक संध्या।
16 जुलाई: मेले का समापन—अपराह्न कवि सम्मेलन और विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं का सम्मान व पुरस्कार वितरण।
मंच के पदाधिकारियों ने शहरवासियों से अधिक से अधिक संख्या में मेले में पहुँचकर आयोजन को सफल बनाने की अपील भी की। बैठक में संरक्षक हुकुम सिंह कुंवर, अध्यक्ष खड़ग सिंह बगड़वाल, सचिव देवेन्द्र तोलिया, कोषाध्यक्ष त्रिलोक बनोली, चंद्रशेखर परगांई, पुष्पा संभल, धरम सिंह बिष्ट, रितिक आर्या, संदीप सिंह भैसोड़ा, बृज मोहन बिष्ट, कमल किशोर सहित कई पदाधिकारी और सदस्य उपस्थित रहे।
