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उत्तराखण्ड

आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के विरोध में बैंक कर्मियों की 36 घंटे की भूख हड़ताल शुरू, हल्द्वानी में जोरदार प्रदर्शन

के बुद्धा पार्क में जोरदार प्रदर्शन किया। United Forum of IDBI Officers & Employees के आह्वान पर 2 एवं 3 नवंबर को आयोजित देशव्यापी 36 घंटे की भूख हड़ताल के तहत कर्मचारियों ने केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) से बैंक की प्रस्तावित बिक्री प्रक्रिया तत्काल रोकने तथा इसके सार्वजनिक क्षेत्र के स्वरूप को बरकरार रखने की मांग उठाई।बुद्धा पार्क में अधिकारियों-कर्मचारियों ने बुलंद की आवाज, केंद्र सरकार से प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री तत्काल रोकने की मांग

कांग्रेस प्रवक्ता दीपक बलूटिया सहित विभिन्न बैंक यूनियनों के पदाधिकारियों ने आंदोलन को दिया समर्थनप्रदर्शन के दौरान कर्मचारियों ने कहा कि आईडीबीआई बैंक महज एक व्यावसायिक बैंक नहीं, बल्कि देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास में छह दशकों से अधिक समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली ऐतिहासिक वित्तीय संस्था है। बैंक ने औद्योगिक विकास, वित्तीय समावेशन और आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूती प्रदान करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। ऐसे में बैंक का निजीकरण केवल कर्मचारियों के भविष्य का सवाल नहीं, बल्कि देश की सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था और आर्थिक हितों से भी जुड़ा हुआ है।

दीपक बलूटिया सहित विभिन्न बैंक संगठनों ने दिया समर्थनआंदोलन को उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता दीपक बलूटिया ने अपना समर्थन देते हुए कर्मचारियों की मांगों को जायज बताया। उन्होंने बैंक कर्मचारियों के आंदोलन के प्रति एकजुटता व्यक्त की।

इसके अलावा AIBOC के अध्यक्ष गौरव जोशी, UFBU के अध्यक्ष रोहित वर्मा तथा UFBU के ओम प्रकाश ने भी धरना स्थल पर पहुंचकर आंदोलन को समर्थन दिया। वहीं AIIDBIOA के महासचिव पीयूष कुमार मौर्य और कार्यकारिणी सदस्य गगन यादव ने अपने संबोधन में निजीकरण के संभावित प्रभावों पर विचार रखते हुए कर्मचारियों का उत्साहवर्धन किया।

संसद में दिए गए आश्वासन का पालन करने की मांगप्रदर्शनकारी कर्मचारियों ने वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह द्वारा संसद के दोनों सदनों में दिए गए उस आश्वासन का मुद्दा भी उठाया, जिसमें आईडीबीआई में कम से कम 51 प्रतिशत सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखने की बात कही गई थी। कर्मचारियों के अनुसार संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 46वीं रिपोर्ट में भी सरकारी हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से कम नहीं रखने की सिफारिश की गई थी।

कर्मचारियों ने सवाल उठाया कि जब संसद में इस संबंध में आश्वासन दिया गया था, तो अब निजीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का औचित्य क्या है? उनका कहना था कि किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक वित्तीय संस्थान के भविष्य से जुड़ा निर्णय लेते समय संसदीय जवाबदेही और सार्वजनिक हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।सार्वजनिक संसाधनों से मजबूत हुए बैंक को निजी हाथों में सौंपने पर सवाल

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि आईडीबीआई बैंक ने वित्तीय संकट और भारतीय रिजर्व बैंक की प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) व्यवस्था के कठिन दौर का सामना किया। इस दौरान सरकार, एलआईसी और बैंक कर्मचारियों के योगदान से बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ और बैंक दोबारा लाभप्रदता हासिल करने में सफल रहा।ऐसे में कर्मचारियों का सवाल है कि जब सार्वजनिक संसाधनों और कर्मचारियों के अथक प्रयासों से बैंक को दोबारा मजबूत बनाया गया है, तो अब इसका नियंत्रण निजी निवेशकों को सौंपने की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है?

कर्मचारियों के अधिकार, पेंशन और आरक्षण नीति को लेकर चिंता

बैंक कर्मियों ने कहा कि निजीकरण की स्थिति में कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और भविष्य की नियुक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। इसके साथ ही सरकारी आरक्षण नीतियों के अनुपालन और सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसरों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

उन्होंने बैंक की परिसंपत्तियों, ग्राहकों की जमा पूंजी और देश की बैंकिंग व्यवस्था पर निजी एवं विदेशी नियंत्रण के संभावित प्रभावों को लेकर भी सरकार से पारदर्शिता बरतने की मांग की। कर्मचारियों का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 14, 38 और 39 की मूल भावना के अनुरूप सरकार को सामाजिक-आर्थिक न्याय और जनहित को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।यूनियन ने रखीं पांच प्रमुख मांगें

आंदोलन के माध्यम से यूनाइटेड फोरम ने केंद्र सरकार के सामने पांच प्रमुख मांगें रखीं। इनमें भारत सरकार एवं एलआईसी द्वारा आईडीबीआई बैंक की प्रस्तावित बिक्री M/s 10955230 Canada Inc. (Fairfax Financial Holding Ltd. की पैरेंट एंटिटी) को तत्काल रोकना, संसद में दिए गए आश्वासन के अनुरूप बैंक में न्यूनतम 51 प्रतिशत सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखना तथा जमाकर्ताओं को सॉवरेन गारंटी प्रदान करना शामिल हैबैंक कर्मियों ने कहा कि निजीकरण की स्थिति में कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और भविष्य की नियुक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। इसके साथ ही सरकारी आरक्षण नीतियों के अनुपालन और सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसरों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

उन्होंने बैंक की परिसंपत्तियों, ग्राहकों की जमा पूंजी और देश की बैंकिंग व्यवस्था पर निजी एवं विदेशी नियंत्रण के संभावित प्रभावों को लेकर भी सरकार से पारदर्शिता बरतने की मांग की। कर्मचारियों का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 14, 38 और 39 की मूल भावना के अनुरूप सरकार को सामाजिक-आर्थिक न्याय और जनहित को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।।इसके अतिरिक्त वर्तमान कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन और कल्याणकारी सुविधाओं की लिखित गारंटी देने तथा सरकारी आरक्षण नीतियों और बैंक की नियुक्तियों के सार्वजनिक क्षेत्र के चरित्र को सुरक्षित रखने की मांग भी उठाई गई।देशव्यापी आंदोलन के जरिए सरकार तक पहुंचाई आवाज

यूनाइटेड फोरम के आह्वान पर 2 और 3 नवंबर को देश के विभिन्न केंद्रों पर अधिकारी एवं कर्मचारी दो दिवसीय भूख हड़ताल में भाग ले रहे हैं। हल्द्वानी में आयोजित प्रदर्शन के दौरान कर्मचारियों ने एकजुट होकर स्पष्ट किया कि वे बैंक के सार्वजनिक स्वरूप और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेंगे।

कर्मचारियों ने केंद्र सरकार से निजीकरण की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने और संसद में दिए गए आश्वासनों का सम्मान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन केवल नौकरी और सेवा शर्तों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था, संसदीय जवाबदेही, सामाजिक न्याय और देश की आर्थिक संप्रभुता की रक्षा से भी जुड़ा है।

प्रदर्शनकारियों ने ‘आईडीबीआई बचाओ, सार्वजनिक बैंकिंग बचाओ’, ‘संसदीय आश्वासन का सम्मान करो’ और ‘कर्मचारियों के अधिकारों एवं सामाजिक न्याय की रक्षा करो’ के नारों के साथ अपना विरोध दर्ज कराया। उन्होंने संकल्प लिया कि बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के स्वरूप को बचाने के लिए उनका आंदोलन जारी रहेगा।देशव्यापी आंदोलन के जरिए सरकार तक पहुंचाई आवाज

यूनाइटेड फोरम के आह्वान पर 2 और 3 नवंबर को देश के विभिन्न केंद्रों पर अधिकारी एवं कर्मचारी दो दिवसीय भूख हड़ताल में भाग ले रहे हैं। हल्द्वानी में आयोजित प्रदर्शन के दौरान कर्मचारियों ने एकजुट होकर स्पष्ट किया कि वे बैंक के सार्वजनिक स्वरूप और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेंगे।

कर्मचारियों ने केंद्र सरकार से निजीकरण की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने और संसद में दिए गए आश्वासनों का सम्मान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन केवल नौकरी और सेवा शर्तों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था, संसदीय जवाबदेही, सामाजिक न्याय और देश की आर्थिक संप्रभुता की रक्षा से भी जुड़ा है।प्रदर्शनकारियों ने ‘आईडीबीआई बचाओ, सार्वजनिक बैंकिंग बचाओ’, ‘संसदीय आश्वासन का सम्मान करो’ और ‘कर्मचारियों के अधिकारों एवं सामाजिक न्याय की रक्षा करो’ के नारों के साथ अपना विरोध दर्ज कराया। उन्होंने संकल्प लिया कि बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के स्वरूप को बचाने के लिए उनका आंदोलन जारी रहेगा।

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