उत्तराखण्ड
DG स्वास्थ्य उत्तराखंड पर RTI नियम तोड़ने के आरोप: CD/DVD की जगह प्रति पृष्ठ ₹2 वसूली और अतिरिक्त पोस्टेज चार्ज से हड़कंप

देहरादून, 29 अप्रैल 2026। उत्तराखंड के महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण (DG स्वास्थ्य) कार्यालय पर सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 के स्पष्ट उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे हैं। सूचना कार्यकर्ताओं ने शिकायत की है कि विभाग द्वारा मांगी गई सूचनाओं को CD/DVD माध्यम से उपलब्ध न कराकर कागजी प्रतियों के नाम पर प्रति पृष्ठ 2 रुपये का शुल्क वसूला जा रहा है। यह RTI नियमों के विपरीत है, जहां डिजिटल माध्यम में सूचना मुफ्त या न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध करानी चाहिए। मनमाना पोस्टेज शुल्क: नियमों की अवहेलना का नया अध्याय RTI अधिनियम 2005 की धारा 7(3) और उत्तराखंड RTI नियमावली 2013 में पोस्टेज शुल्क के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। फिर भी DG स्वास्थ्य कार्यालय द्वारा हर आवेदन पर 50 से 100 रुपये तक अलग से पोस्टेज चार्ज मांगा जा रहा है। इससे साधारण नागरिकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ रहा है। एक कार्यकर्ता ने बताया, “यह RTI की भावना के खिलाफ है, जो पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए बनी थी, न कि बाधा डालने के लिए।”
विभागों में दोहरा चरित्र: एक ही सरकार, अलग-अलग नियम
हैरानी की बात है कि राज्य सरकार के अन्य विभागों में अलग नीति अपनाई जा रही है: चिकित्सा सचिव कार्यालय: CD/DVD में सूचना देने पर प्रति पृष्ठ ₹2 शुल्क लिया जाता है, लेकिन पोस्टेज चार्ज शून्य। कार्मिक एवं सतर्कता अनुभाग: RTI नियम 6(c) के पूर्ण अनुपालन में DVD माध्यम से सूचना उपलब्ध कराई जाती है, बिना किसी अतिरिक्त पोस्टेज शुल्क के।सूचना अधिकार विशेषज्ञों का मत है कि 2005 में केंद्र द्वारा RTI अधिनियम लागू होने और 2013 में उत्तराखंड सरकार द्वारा अपनी नियमावली बनाने के 13 वर्ष बाद भी लोक सूचना अधिकारी (PIO) भ्रमित हैं। “जिसे जो सही लगता है, वही कर रहा है,” एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा। कार्यकर्ताओं की मांग: जांच और एकसमान व्यवस्था प्रमुख RTI कार्यकर्ताओं ने राज्य शासन से निम्नलिखित मांगें की हैं: DG स्वास्थ्य कार्यालय पर अनियमितताओं की उच्च स्तरीय जांच। सभी विभागों में RTI नियमों की एकरूप व्याख्या और प्रशिक्षण।।डिजिटल माध्यम (CD/DVD) को प्राथमिकता देकर कागजी शुल्क समाप्त करना।।अनावश्यक पोस्टेज चार्ज पर पूर्ण प्रतिबंध। शासन की चुप्पी: क्या होगा अगला कदम?अभी तक DG स्वास्थ्य या राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। सूत्रों के अनुसार, मुख्य सचिव कार्यालय ने मामले को संज्ञान में लिया है। यदि शासन ने त्वरित कार्रवाई नहीं की, तो कार्यकर्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की चेतावनी दे रहे हैं। उत्तराखंड में RTI पारदर्शिता का मजबूत हथियार है, लेकिन ऐसे मामले उसकी विश्वसनीयता को कमजोर कर रहे हैं। निगाहें अब शासन के फैसले पर टिकी हैं—क्या बनेगी समान नीति या जारी रहेगा भ्रम?



