उत्तराखण्ड
दून पुस्तकालय में गूंजा पहाड़ का बचपन और लोक-स्मृतियां, ‘दादी का रेडियो’ व ‘ठहरे किनारे’ का लोकार्पण

देहरादून, 5 अक्टूबर 2026। दून पुस्तकालय में सोमवार को रचनाकार ज्योत्स्ना जोशी की दो पुस्तकों—‘दादी का रेडियो’ (संस्मरण) और ‘ठहरे किनारे’ (काव्य संग्रह)—का लोकार्पण साहित्यिक गरिमा और पहाड़ी लोकजीवन की आत्मीय स्मृतियों के बीच हुआ। समय साक्ष्य प्रकाशन की ओर से आयोजित समारोह में देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, शिक्षाविदों और समाजकर्मियों ने प्रतिभाग किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार मुकेश नौटियाल ने की। मुख्य वक्ता शिक्षाविद डॉ. उमा भट्ट, साहित्यकार डॉ. सुरेंद्र दत्त सेमल्टी और सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप रावत ने दोनों पुस्तकों की रचनात्मक विशेषताओं पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन निक्की पुष्कर ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ ज्योत्स्ना जोशी की कविताओं के भावपूर्ण पाठ से हुआ। कान्ता घिल्डियाल और मधुरवादिनी तिवारी ने कविताओं का पाठ कर सभागार में साहित्यिक वातावरण को और जीवंत बना दिया।
वरिष्ठ कथाकार मुकेश नौटियाल ने ‘दादी का रेडियो’ को महज संस्मरण न बताते हुए इसे पहाड़ के विस्थापन और स्मृति के बीच का सेतु बताया। उन्होंने कहा कि लेखिका ने ‘गांव की सुबह’ के माध्यम से खाली गागर की खनखनाहट, पंदेरे पर पानी भरने जाती महिलाओं की खिलखिलाहट, सट्टी कूटने की आवाज और बोडा जी के मंत्रोच्चारण जैसी ध्वनियों को जिस जीवंतता से दर्ज किया है, वह उत्तराखंड के लोकजीवन को साहित्य में पुनर्जीवित करने जैसा है।
डॉ. उमा भट्ट ने कहा कि ‘दादी का रेडियो’ में दो पीढ़ियों का बेहद आत्मीय और जीवंत संवाद दिखाई देता है। दादी का प्यार और डांट के साथ पोती को जगाना तथा कच्ची नींद में करवट बदलते हुए लेखिका का पूरे गांव की ध्वनियों को महसूस करना हर पहाड़ी परिवार की साझा स्मृति जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि पुस्तक पहाड़ के जीवन, प्रकृति और पारिवारिक रिश्तों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ सामने लाती है।
वहीं डॉ. सुरेंद्र दत्त सेमल्टी ने ‘ठहरे किनारे’ काव्य संग्रह पर चर्चा करते हुए कहा कि “ठहराव भी एक गति है।” उन्होंने कहा कि झील के किनारे बैठी स्त्री की तरह संग्रह की कविताएं जीवन के ठहरे हुए क्षणों में गहराई तक उतरती हैं और पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप रावत ने कहा कि पहाड़ की स्मृतियों, लोकजीवन और संस्कृति को शब्द देने वाली ऐसी रचनाएं नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इस अवसर पर रचनाकार ज्योत्स्ना जोशी ने अपने गांव, बचपन और लेखन प्रक्रिया से जुड़े अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उनका गांव रुद्रप्रयाग जिले में तिलवाड़ा से लगभग तीन किलोमीटर पैदल दूरी पर गहरी समतल जगह में बसा है और चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ है। उन्होंने अपने बचपन को जीवन का अनमोल और अविस्मरणीय अल्हड़ दौर बताते हुए कहा कि उस समय सूरज की किरणें मानो पलकों में रखकर जगाया करती थीं। उन्होंने दादी के साथ जुड़ी आत्मीय स्मृतियों को भी साझा किया, जिन्हें सुनकर सभागार तालियों से गूंज उठा।
समारोह में मौजूद साहित्यकारों और रचनाकारों ने दोनों पुस्तकों को पहाड़ी जीवन, लोक-स्मृति और स्त्री-संवेदना की प्रभावी अभिव्यक्ति बताया। वक्ताओं ने कहा कि ‘दादी का रेडियो’ जहां बीते पहाड़ की ध्वनियों और स्मृतियों को सहेजता है, वहीं ‘ठहरे किनारे’ जीवन के भीतर के ठहराव, संवेदनाओं और अनुभवों को कविता के माध्यम से सामने लाता है।
कार्यक्रम में अतुल शर्मा, अरुण कुकसाल, मदन डुकलाण, रमाकांत बेंजवाल, बीना बेंजवाल, जेपी मैठाणी, डॉ. लालता प्रसाद, गीता गैरोला, एसके नौटियाल, देवेंद्र कांडपाल, एस. नैथानी, सारिका सूरी, चंद्र शेखर तिवारी, रमा





















