उत्तराखण्ड
डिजिटल दौर में भी अखबार की स्याही से जुड़ा ज्ञान, बेस अस्पताल गेट पर दिखी पढ़ने की पुरानी ललक

हल्द्वानी के बेस अस्पताल के गेट के बाहर ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला। एक व्यक्ति बड़े इत्मीनान से अखबार पढ़ने में व्यस्त था। आसपास डिजिटल दुनिया की चहल-पहल थी, हाथों में मोबाइल थे और हर किसी की नजर अपनी स्क्रीन पर थी, लेकिन वह व्यक्ति पूरी तल्लीनता के साथ अखबार के पन्ने पलट रहा था।
जब उनसे अखबार पढ़ने की वजह पूछी गई तो उन्होंने सहजता से कहा कि “अखबार पढ़ने में मेरी रुचि है। कई लेखकों के लेख पढ़ता हूं, उनसे काफी ज्ञान मिलता है।”
उनकी यह बात डिजिटल युग और प्रिंट मीडिया के बीच के फर्क को बखूबी सामने रखती है। मोबाइल और डिजिटल माध्यम हमें घटना की खबर सबसे पहले दे सकते हैं, लेकिन अखबार अक्सर उसी घटना को संदर्भ, विश्लेषण और विचार के साथ हमारे सामने रखता है।
आज भी कई लोगों की सुबह चाय की चुस्की और अखबार के साथ शुरू होती है। जब तक हाथ में अखबार न आए, जैसे सुबह अधूरी सी लगती है। खबरों के साथ-साथ संपादकीय, आलेख, विचार और विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों की राय पाठक को सिर्फ सूचना नहीं देती, बल्कि सोचने और समझने का अवसर भी देती है।
डिजिटल माध्यम की अपनी तेज रफ्तार है। यहां खबर पहले पहुंचती है, अपडेट लगातार मिलते हैं और दुनिया एक छोटी सी स्क्रीन में सिमट जाती है। मगर अखबार के पन्नों पर दर्ज शब्दों को पढ़ने का अपना अलग अनुभव है। खबर से आगे बढ़कर विचार और विश्लेषण पढ़ने की परंपरा आज भी अखबार को प्रासंगिक बनाए हुए है।
शायद यही वजह है कि डिजिटल युग में भी कुछ लोग मोबाइल की चमकती स्क्रीन के बजाय अखबार की स्याही में ज्ञान तलाशते हैं। खबर भले ही मोबाइल पहले दे दे, लेकिन ज्ञान के लिए आज भी अखबार के पन्ने कई पाठकों को अपनी ओर खींचते हैं।





















