उत्तराखण्ड
खूब हुई जोर आजमाइश, फिर भी सत्ता पक्ष के हाथ खाली

किच्छा पालिका चुनाव में कांग्रेस का पलड़ा भारी, बेहड़ के पक्ष में गया जनादेश; शुक्ला की रणनीति पर उठे सवाल
किच्छा। किच्छा नगर पालिका चुनाव इस बार महज अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं था। यह सीधे तौर पर मौजूदा कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ और भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के राजनीतिक प्रभाव और प्रतिष्ठा की परीक्षा बन गया था। चुनाव के दौरान दोनों खेमों ने पूरी ताकत झोंकी और मुकाबला उस समय और अधिक तल्ख हो गया, जब मतदान के बाद स्ट्रांग रूम के बाहर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए और विवाद थप्पड़ कांड तक पहुंच गया।
लेकिन जब मतपेटियां खुलीं तो राजनीतिक जोर-आजमाइश का अंतिम फैसला जनता के वोट ने किया। किच्छा में कांग्रेस के राजेश प्रताप सिंह ने भाजपा के संदीप अरोड़ा को पराजित किया। सिरौलीकलां में भी कांग्रेस की राशिदा बेगम ने जीत दर्ज की। इस तरह दोनों पालिकाओं के अध्यक्ष पद कांग्रेस के खाते में चले गए।
किच्छा का परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चुनाव से पहले भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने अपने प्रत्याशी के लिए पूरी ताकत लगाने का दावा किया था, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह के पीछे विधायक तिलकराज बेहड़ सक्रिय थे। चुनाव को पहले से ही दोनों नेताओं की सियासी साख की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा था।
नतीजे ने फिलहाल स्थानीय निकाय की राजनीति में बेहड़ के पक्ष में राजनीतिक बढ़त का संकेत दिया है, जबकि शुक्ला की चुनावी रणनीति और संगठनात्मक प्रबंधन को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि किसी एक निकाय चुनाव के परिणाम को किसी नेता के व्यापक राजनीतिक भविष्य का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता।
दिलचस्प यह भी है कि चुनाव के दौरान सत्ता पक्ष की ओर से जोरदार राजनीतिक सक्रियता के बावजूद किच्छा और सिरौलीकलां दोनों जगह कांग्रेस ने अध्यक्ष पद हासिल कर लिया। ऐसे में सवाल अब यह है कि क्या किच्छा का यह जनादेश केवल निकाय चुनाव तक सीमित रहेगा या आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित करेगा?
किच्छा की राजनीति में थप्पड़ की गूंज भले लंबे समय तक सुनाई देती रहे, लेकिन चुनाव का सबसे बड़ा संदेश मतपेटियों से निकला राजनीतिक ताकत का अंतिम फैसला आखिरकार मतदाता ही करता है।





















