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उत्तराखण्ड

तीन कार्यकालों में नियुक्तियों से लेकर तमाम भ्रष्टाचार के आरोपी रहे मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति को चौथा कार्यकाल क्यों देना चाहती है धामी सरकार,,

उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में कुलपति की पुनः नियुक्ति की कोशिशें नियमों और मानकों की खुली अवहेलना

हल्द्वानी,,,उत्तराखंड की धामी सरकार द्वारा उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति की पुनः कुलपति के पद पर चौथे कार्यकाल के लिए नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का काम नियमों को ताक पर रखते हुए किया जा रहा है। अपने तीन कार्यकालों में नियुक्तियों से लेकर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे रहे वर्तमान कुलपति को चौथा कार्यकाल देने पर राज्य की भाजपा सरकार क्यों आमादा है? क्या वजह है कि उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में कुलपति बनने की अधिकतम आयु सीमा पैंसठ साल से अधिक सड़सठ साल पूरा कर चुके व्यक्ति को नियम विरुद्ध पुनः कुलपति बनाया जाना राज्य सरकार को जरूरी लग रहा है? इसका जवाब राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत को जनता के सम्मुख देना चाहिए।

गौरतलब है कि उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय ऐक्ट 31 अक्टूबर 2005 और उस समय यूजीसी के नियम के अनुसार कुलपति की अधिकतम अहर्ता आयु पूरे देश के विश्वविद्यालयों में 65 वर्ष थी। ऐक्ट में संशोधन नहीं होने से अधिकतम आयु सीमा में छूट न दिए जाने पर स्पष्ट है कि कुलपति के लिए उस समय यूजीसी की अधिकतम आयु सीमा 65 वर्ष ही अभी भी लागू है। यूजीसी रेगुलेशन 2018 के अनुसार 65 वर्ष के बाद तो कोई भी कुलपति पद हेतु आवेदन भरने के लिये अर्ह तक नहीं होता है। साफ है कि, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति उच्च शिक्षा विभाग और कुलाधिपति कार्यालय को गुमराह कर मानकों और नियमों को तार तार करते हुए इस अवैध प्रक्रिया को अंजाम दे रहे है।

जब यूजीसी के नियम के अनुसार बिना ऐक्ट में संशोधन के कुलपति की नियुक्ति में अधिकतम आयु 65 से 70 किया जाना अवैध है। तो आगे सेवा विस्तार देने की तो बात ही छोड़िए 65 वर्ष से अधिक आयु के अभ्यर्थियों को तो सर्च कमेटी द्वारा बुलाया जाना अथवा पैनल में लिया जाना भी नियम विरुद्ध है। सच तो यह है कि प्रो. ओम प्रकाश नेगी की कुलपति पद पर वर्तमान नियुक्ति भी एक अवैध नियुक्ति है, इसलिए उनकी कुलपति पद पर नियुक्ति तत्काल निरस्त की जानी चाहिए।

उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति ओम प्रकाश नेगी को हटाया जाना इसलिए भी जरूरी है कि उन पर विश्वविद्यालय में बड़े पैमाने पर नियुक्तियों में भ्रष्टाचार समेत कई भ्रष्टाचार को अंजाम देने के गंभीर आरोप हैं। लेकिन इस संबंध में तमाम लोगों द्वारा राज्य सरकार और कुलाधिपति को सूचित करने, मीडिया में आने के बाद भी उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार ने कोई कार्यवाही करने के बजाय उनको संरक्षण देने का ही काम किया है। उच्च न्यायालय में वर्तमान कुलपति के कार्यकाल में नियुक्तियों और अन्य भ्रष्टाचार को लेकर तीन मुकदमे दर्ज हैं।

भ्रष्टाचार के आरोपी ऐसे कुलपति की फिर से नियुक्ति करने की कोशिश करने के बजाय उनके ख़िलाफ़ जांच कर मुक़दमा दर्ज किया जाना चाहिए था लेकिन बड़े पैमाने पर नियुक्तियों में भ्रष्टाचार के आरोपी कुलपति को पुनः कुलपति बनाने की कोशिश से राज्य के मुख्यमंत्री और उच्च शिक्षा मंत्री क्या संदेश देना चाहते हैं, यह कोई समझ में न आने वाली रॉकेट साइंस नहीं है।

भाकपा (माले) नैनीताल जिला कमेटी मांग करती है कि, कुलपति चयन की वर्तमान प्रक्रिया से प्रो. ओम प्रकाश नेगी के नाम को तुरंत बाहर किया जाय। साथ ही भ्रष्टाचार के आरोपी ऐसे कुलपति की फिर से नियुक्ति करने के बजाय उनके पद से हटाते हुए उनके ख़िलाफ़ माननीय उच्च न्यायालय की निगरानी में जांच कर मुक़दमा दर्ज किया जाना चाहिए। जिससे राज्य की जनता का उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय की एकेडमिक गतिविधियों में विश्वास पैदा हो और विश्वविद्यालय भ्रष्टाचार मुक्त होने की दिशा में अग्रसर होकर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः हासिल कर सके, यही न्याय का भी तकाजा है डॉ. कैलाश पाण्डेय,
नैनीताल जिला सचिव, भाकपा (माले) ,

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