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उत्तराखण्ड

80 हजार करोड़ के कर्ज के भार तले दबा उत्तराखंड, नेताओं के भत्ते और युवाओं की बेरोजगारी पर सवाल”


देहरादून, / हल्द्वानी ,,,,4 फरवरी 2026 – राज्य बनने के 25 साल बाद भी उत्तराखंड आज लगभग 80 हजार करोड़ रुपये के कर्ज के भार तले दबा हुआ है, जबकि युवाओं की बेरोजगारी और महँगाई ने आम जनता की चिंता और बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, राज्य का कर्ज आज उसके सालाना बजट से भी ज़्यादा है और बजट का लगभग 45% हिस्सा सिर्फ कर्मचारी वेतन, पेंशन और पुराने कर्ज के ब्याज पर खर्च हो जाता है। सत्ता और विपक्ष दोनों की ओर से कर्ज के लिए एक‑दूसरे को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में कर्ज सबसे तेज़ दर से बढ़ा, जबकि सत्ताधारी पार्टी का तर्क है कि बजट और विकास दर भी कई गुना बढ़ी हैं, इसलिए कर्ज को सामान्य विकास‑प्रक्रिया का हिस्सा बताया जा रहा है। इस बीच, नेताओं के वेतन, भत्ते और यात्रा‑व्यय में लगातार वृद्धि होती रही है, जबकि कर्ज कम करने या रोजगार‑उत्पादक उद्योग लगाने के लिए कोई विशेष उच्च‑स्तरीय बैठक या दीर्घकालिक योजना सार्वजनिक नहीं हुई। जनता के बीच यह बात आम है कि “चुनावी घोषणाएँ और भत्तों के फैसले जल्दी होते हैं, लेकिन कर्ज और बेरोजगारी पर गंभीर चर्चा नहीं होती।” उत्तराखंड में पढ़े‑लिखे युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, क्योंकि राज्य की अर्थव्यवस्था ज़्यादातर सरकारी नौकरियों और छोटे‑मोटे व्यवसायों पर टिकी है, जबकि बड़े उद्योग या मैन्युफैक्चरिंग बेस नहीं बन पाए। महँगाई की मार से लगभग हर घर में दो या दो से ज़्यादा युवा बेरोजगार होने की बात आम जनता के अनुभव से जुड़ी है, लेकिन इस पर सरकारी स्तर पर कोई ठोस, निरंतर रोजगार‑उत्पादक योजना दिखाई नहीं देती। स्थानीय विश्लेषकों का कहना है कि “कर्ज, बेरोजगारी और महँगाई के त्रिकोण ने आम जनता का विश्वास डगमगा दिया है और अगले चुनाव में नेताओं के वादों पर जनता अब ज़्याद सख्ती से सवाल उठाएगी।”

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