उत्तराखण्ड
उत्तराखंड के भूतिया गांवों के लिए नई केंद्रीय योजना की मांग, लोकसभा में अजय भट्ट ने उठाया मुद्दा,,
नई दिल्ली, 27 मार्च 2026:,
पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री व नैनीताल–उधम सिंह नगर संसदीय क्षेत्र से सांसद श्री अजय भट्ट ने शुक्रवार को लोकसभा के शून्य काल के दौरान उत्तराखंड के खाली हो चुके भूतिया गांवों के पुनर्स्थापन (पुनर्वास) के लिए केंद्र सरकार से एक नई योजना और विशेष आर्थिक पैकेज की मांग की। उन्होंने कहा कि मध्य हिमालय के गांवों में भी सीमावर्ती गांवों के अनुसार “वाइब्रेंट विलेज” की तर्ज पर विकास–पुनर्वास नीति जरूरी है।
भूतिया गांवों की चिंता
अजय भट्ट ने बताया कि उत्तराखंड में 2025 तक लगभग 1700 से अधिक गांव पूरी तरह निर्जन हो चुके हैं, जिन्हें अब भूतिया या “घोस्ट विलेज” कहते हैं। इन गांवों में घर खंडहर, खेत–फार्म बंजर और जमीन बर्बाद हालत में हैं, जहां कभी लोगों की आवाज़, त्योहारों के गीत और सामूहिक उत्सव हुआ करते थे, वहां अब बाघ, तेंदुआ, भालू, बंदर और अन्य जंगली जानवरों की आवाजाही होती है।
पलायन और संस्कृति का विघटन
सांसद ने कहा कि रोजगार की तलाश में युवा अपने गांव छोड़कर बड़े शहरों में जाने के कारण ये गांव एक‑एक करके “माइग्रेटेड” हो चुके हैं और भूतिया बन चुके हैं।
उन्होंने जोर दिया कि इससे न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही है, बल्कि लोकसंस्कृति, भाषा–बोलचाल और सामुदायिक जीवन के रूप भी धीरे‑धीरे खत्म हो रहे हैं।
वाइब्रेंट विलेज का उदाहरण
श्री भट्ट ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीमावर्ती गांवों के लिए चल रही “वाइब्रेंट विलेज योजना” को उदाहरण बताया, जिसमें उत्तराखंड के 91 सीमावर्ती गांवों को चयनित करके बुनियादी ढांचा, आजीविका और सुरक्षा व्यवस्था सुधारी जा रही है।
उन्होंने कहा कि इस योजना से सीमावर्ती क्षेत्रों में पलायन रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिल रही है, जिसकी तर्ज पर मध्य हिमालय के गांवों के लिए भी अलग नीति बनाई जानी चाहिए।
केंद्र से नई योजना की मांग
अजय भट्ट ने सदन में सुझाव दिया कि भूतिया गांवों को फिर से बसाने के लिए रोजगार‑सृजन, कृषि–प्रौद्योगिकी, पर्यटन आधारित आजीविका और आधुनिक बुनियादी सुविधाओं वाली एक विशेष केंद्रीय योजना बनाई जाए।
उन्होंने केंद्र सरकार से इन गांवों के लिए ठोस रीवर्स माइग्रेशन नीति, विशेष आर्थिक पैकेज और गांवों को फिर से आबाद करने की व्यवस्थित योजना तैयार करने की मांग की, ताकि जंगल बन चुके गांवों में फिर से लोग बस सकें और स्थानीय संस्कृति को भी बचाया जा सके।















