उत्तराखण्ड
शिक्षा का स्वर्णिम अतीत: जब गुरु देवता थे और दक्षिणा सम्मान,,
पवनीत सिंह बिंद्रा
हल्द्वानी, 12 अप्रैल 2026: एक समय था जब भारतीय शिक्षा गुरु-शिष्य परंपरा की मजबूती पर टिकी थी। शिक्षक ईश्वर से कम नहीं माने जाते थे। शिष्य न केवल ज्ञान ग्रहण करते, बल्कि गुरु दक्षिणा देकर उनका सम्मान करते। विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षक स्वयं योगदान देते। प्रथम कक्षा से 12वीं तक की पुस्तकें दान की जातीं। पूरे भारत के ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा आज भी बुजुर्गों की स्मृतियों में जीवित है, जहां शिक्षक परिवार की तरह समर्पित रहते थे।
वर्तमान संकट: स्कूल बने आमदनी के केंद्र, अभिभावकों की कमर टूटी
आज की तस्वीर विपरीत है। उत्तराखंड में निजी स्कूलों की फीस और विविध शुल्कों ने मध्यम वर्ग को तोड़ दिया। मासिक फीस 3-5 हजार से शुरू, यूनिफॉर्म, किताबें, स्टेशनरी—सब तय दुकानों से। हल्द्वानी और नैनीताल जैसे शहरों में अभिभावक बताते हैं कि एक बच्चे की पढ़ाई पर सालाना 50-70 हजार खर्च एवं कोई सीमा नहीं है। आर्थिक कमजोरी से कई बच्चे शिक्षा से वंचित। “हमारी कमर टूट चुकी है,” कहते हैं भले सरकार अपने आंकड़ों पर डिंडोरा पिटती है एवं झूठा प्रचार प्रसार किया जाता है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है आज शिक्षा पूरी तरह से बाजारकरण हो चुका है सूत्रों द्वारा बताया गया है सारा खेल पब्लिकेशन द्वारा ही किया जाता है क्योंकि इसकी कोई सीमा नहीं है एवं अपना सिलेबस निजी स्कूलों से साठ गांठ कर स्कूलों से कमीशन से सारी भूमिका निभाते हैं
सरकारी दावे खोखले: सरकारी स्कूलों में सन्नाटा, निजीकरण पर अनियंत्रण
सरकार ‘शिक्षा क्रांति’ के दावे करती है, लेकिन हकीकत कड़वी। उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का फोकस वेतन पर, शिक्षा पर नहीं। कई स्कूलों में छात्र संख्या नगण्य—हल्द्वानी ब्लॉक में 30% स्कूल आधी क्षमता पर। अभिभावक निजी स्कूलों पर निर्भर, जो बाजारीकरण के शिकार। हर गली में स्कूल खुल रहे, फीस आसमान छू रही। शिक्षा विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 2025-26 में निजी स्कूलों की संख्या 20% बढ़ी।
अभिभावकों की पुकार: कॉपी से ड्रेस तक हर चीज महंगी, सुधार की मांग
कॉपी-किताब से लेकर यूनिफॉर्म तक सब तय। अभिभावक संगठन ‘उत्तराखंड पैरेंट्स फोरम’ ने चेतावनी दी—बिना नियंत्रण के शिक्षा संकट गहराएगा। सुझाव: फीस कैप, सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता सुधार, मुफ्त किताब-ड्रेस योजना। विशेषज्ञ कहते हैं, पुरानी गुरु-शिष्य भावना लौटानी होगी।
निष्कर्ष: शिक्षा बचाओ अभियान जरूरी
उत्तराखंड सरकार को तत्काल कदम उठाने चाहिए। अन्यथा, शिक्षा अभिभावकों के लिए बोझ बनेगी। (स्रोत: स्थानीय सर्वेक्षण एवं अभिभावक साक्षात्कार) कुल मिलकर आप जितना भी इस पर अभियान चलवा दीजिए होना कुछ नहीं है ये सब खेल पब्लिकेशन द्वारा आयोजित किया जाता है एवं उनकी सृजनात्मक शक्ति से इस प्रदेश में शिक्षा नीति तय की जाती है,,,कुछ दिन समाचार पत्रों में छपता है होता कुछ नहीं है आखिर एक अभिभावक को इस दौर से गुजरना पड़ता है,,
















